प्रत्याशियों में यशवंत, जयवीर और महेंद्र सिंह के रूप में तीन ठाकुर, विजय बहादुर पाठक के रूप में एक ब्राह्मण, सरोजनी अग्रवाल के रूप में एक वैश्य, अशोक धवन के रूप में एक खत्री, अशोक कटारिया के रूप में एक पिछड़े और विद्यासागर के रूप में एक दलित तथा मोहसिन रजा और बुक्कल नवाब के रूप में दो मुस्लिम हैं।
अपना दल कोटे से आशीष के रूप में एक और पिछड़े को जगह दी गई है। माना जा रहा था कि गोरखपुर व फूलपुर में बड़ी संख्या में निषाद मतदाताओं के भाजपा से कट जाने को देखते हुए पार्टी इस बिरादरी के किसी न किसी शख्स को परिषद भेजेगी। पर, ऐसा नहीं हुआ।
हालांकि कहा जा रहा है कि कुछ संस्थाओं में इनका मनोनयन करके संतुलन बनाया जाएगा। इसी तरह अन्य अति पिछड़ी जातियों को नुमाइंदगी देने की संभावनाएं भी पूरी नहीं हुईं। दलितों पर फोकस कर रही भाजपा का सिर्फ एक दलित चेहरे को विधान परिषद भेजना भी कुछ असंतुलन दिखा रहा है। ऐसा लगता है कि पार्टी निकट भविष्य में किसी अन्य तरीके से इसकी भरपाई करने की सोच रही है।
दूसरे दलों से आए चार लोगों को छोड़ दें तो दस उम्मीदवारों में छह भाजपा के ही हैं। इनमें भी मोहसिन रजा को छोड़कर पांच तो मूल काडर के हैं। महेंद्र सिंह को पार्टी दोबारा भेज रही है। बाकी चार पार्टी में लंबे समय से काम करते रहे हैं। पार्टी ने इन्हें उम्मीदवार बनाकर कार्यकर्ताओं में पैदा हो रहे अंसतोष की आग पर पानी डालने की कोशिश की है।
हालांकि पार्टी में बहुत ऐसे लोग हैं जिनका योगदान संभवत: टिकट पाने वालों से अधिक रहा है। पर, संकेतों को समझा जाए तो पार्टी ने यही बताने की कोशिश की है कि इंतजार करेंगे तो कुछ न कुछ उनके भी हिस्से में आएगा।
कैराना फैक्टर
बिजनौर के अशोक कटारिया के टिकट के पीछे कैराना फैक्टर नजर आ रहा है। हुकुम सिंह के निधन के कारण कैराना संसदीय सीट का और बिजनौर में विधानसभा की नूरपुर सीट पर चुनाव होना है। कटारिया गुर्जर हैं। कैराना सहित पश्चिम में गूजर की अच्छी खासी आबादी है। प्रदेश सरकार में कोई मंत्री गुर्जर नहीं है। माना जा रहा है कि कटारिया के जरिये भाजपा ने इस कमी को पूरी कर इस वर्ग के लोगों को साधने की कोशिश की है।