पितरों के प्रति श्रद्धा का पर्व पितृपक्ष मंगलवार शुरू हो रहा है, लेकिन सोमवार को मध्याह्न भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा का मान होने से पूर्णिमा को पितरों का तर्पण-श्राद्ध कर्म करना श्रेयस्कर रहेगा।
मंगलवार से आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा लगने से पितृपक्ष में पितरों का पूजन-तर्पण उसी दिन से शुरू हो जाएगा।
पितृपक्ष की जिन तिथियों में पितरों-पूर्वजों की मृत्यु होती है, जजमानों को उन्हीं तिथियों में अपने पितर का तर्पण करना चाहिए।
इसके अलावा प्रतिदिन भी पितरों का श्राद्ध करना चाहिए। महानगर निवासी आचार्य प्रदीप ने बताया कि सोमवार को सुबह 10:08 बजे से पूर्णिमा लग जाएगी, मंगलवार को सुबह 7:44 बजे तक पूर्णिमा का मान रहेगा।
उन्होंने बताया कि सोमवार को मध्याह्न में ही पूर्णिमा का मान मिलने के चलते व्रत, श्राद्ध की पूर्णिमा का उसी दिन तर्पण करना उत्तम रहेगा।
जबकि मंगलवार को प्रतिपदा से पितृपक्ष की तिथिवार तर्पण होगा। आचार्य ने बताया कि पितृपक्ष केदौरान नवमी को सुहागिन औरतों का और अकाल मृत्यु पाए या जिनका मृत्यु काल स्पष्ट न हो उन्हें अमावस्या को तर्पण करना चाहिए। इस दौरान मंगल कार्यों से बचना चाहिए।
पूजन विधि
आचार्य प्रदीप के मुताबिक, सुबह स्नान-पूजन के बाद जजमान को पितरों को तर्पण के साथ पिंडदान करना चाहिए। हथेली भर अनाज का पिंड (जौं के आटे या खीर या गौ दुग्ध के खोये) बनाकर उसे पितरों को अर्पण करना चाहिए। इसके अलावा गंगाजल, कुश, काले तिल, फूल-फल और दुग्ध व उनसे बने खाद्यान्न अर्पण करने चाहिए।
मध्याह्न से पहले ब्राह्मण को भोज कराने के साथ उन्हें यथायोग्य वस्त्रादि दान देना चाहिए। आचार्य के मुताबिक, सुबह 11 बजकर 33 मिनट से 12 बजकर 21 मिनट के मध्य पितृपक्ष के श्राद्ध के लिए बेहतर समय है।