लखनऊ। आरक्षी धीरज कुमार को करीब 10 साल बाद राहत मिली है। मां के इलाज के लिए ड्यूटी से गैरहाजिर होने पर उन्हें सजा मिली थी। उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण के न्यायिक सदस्य रविंद्र नाथ त्रिपाठी ने उनकी परिनिंदा प्रविष्टि और वेतन-भत्ता रोकने की सजा शुक्रवार को सुनवाई के दौरान रद्द कर दी।
बागपत के विजरोय गांव निवासी धीरज कुमार की नियुक्ति वर्ष 1998 में आरक्षी पद पर हुई थी। वर्ष 2015 में सहारनपुर की पुलिस लाइन में तैनाती के दौरान उन्हें नौ अक्तूबर को कानून-व्यवस्था ड्यूटी के लिए देवबंद भेजा गया था। वह 123 दिन अनुपस्थित रहे। वह ड्यूटी पर नहीं पहुंचे और अलग-अलग अवधि में कुल 123 दिन गैरहाजिर रहे। प्रारंभिक जांच में उन्होंने मां के इलाज के लिए गैरहाजिर रहने की बात कही। उन्होंने यह भी माना कि उच्च अधिकारियों को सूचना नहीं दी थी। 5 मई 2016 को कारण बताओ नोटिस जारी हुआ। जवाब न देने पर 7 जून 2016 को उन्हें सजा दी गई।
धीरज कुमार ने 27 अक्तूबर 2021 को शासन में प्रत्यावेदन दिया था, जिसे 11 जुलाई 2022 को खारिज कर दिया गया। अधिकरण ने कहा कि केवल कर्मचारी के जवाब न देने से आरोप सिद्ध नहीं माने जा सकते। दंडाधिकारी को आरोपों और साक्ष्यों की स्वतंत्र जांच करनी चाहिए थी। अधिकरण ने दोनों दंडादेश निरस्त किए और निर्देश दिया कि यदि धीरज कुमार के पास अर्जित या उपलब्ध अवकाश है तो 123 दिन की अनुपस्थिति समायोजित कर वेतन-भत्ते का भुगतान किया जाए। आदेश के अनुपालन के लिए तीन महीने का समय दिया गया है। आरक्षी धीरज कुमार वर्तमान में बुलंदशहर में तैनात हैं।