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अवधी चित्रकारी जो लखनऊ को 'असर' देती है

Thu, 01 Aug 2013 01:33 PM IST
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
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यह बहस का मुद्दा हमेशा से रहा कि अवध स्कूल ऑफ पेंटिंग कुछ है या नहीं? पर बहुत देर में ही सही लोगों ने इस बात को मान लिया कि लखनऊ की अपनी एक चित्रकला शैली भी है।
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यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि अवध की चित्रकला पर सबसे ज्यादा प्रभाव हिंदू मुस्लिम सद्भावना का पड़ा है।

इतिहासकार योगेश प्रवीण अपनी किताब 'आपका लखनऊ' में लिखते हैं कि राम चरित मानस के लेखक गोस्वामी तुलसीदास का क्षेत्र अवध रहा है इसलिए रामावतार की लीला के प्रकरण यहां मंदिरों की दीवारों और शिवालों के अंदर मिलते हैं।

अवध में प्रथम नवाब सआदत खां बरहानुल मुल्क के शासनकाल में सन् 1725 की एक पेंटिंग प्राप्त है जिसके बनाने वाले का नाम किसी को नहीं मालूम लेकिन यह पेंटिंग हर देखने वाले का ध्यान खींचती है।
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ऐसा कहा जाता है कि ऐसी ही और कई कलाकृतियां इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी लंदन में सुरक्षित है जिसे लखनऊ के ब्रिटिश रेजीडेंट रिचर्ड जानसन अपने साथ लंदन ले गए थे।

यह सच है कि लखनऊ में नवाबी दौर के प्रारंभिक चित्रकार दिल्ली से स्थानांतरित होकर आए थे क्योंकि तत्कालीन तस्वीरों में मुगल स्टाइल का अच्छा असर पेश आता है।

ब्रिटेन से आए थे कोटिल
नवाब सफदरगंज के शासनकाल का बना हुआ चित्र राजा नवलराय का चित्र इस बात को सिद्ध करता है। प्रवीण अपनी किताब में आगे लिखते हैं कि नवाब शुजाउद्दौला के समय में फ्रांसीसी सेनापति जोसेफ जेंटिल ने ब्रिटिश चित्रकार टिल्ली कोटिल कोकलकत्ता से फैजाबाद बुलाया था।

कोटिल ने ऑयल पेंटिंग पर आधारित छह शानदार चित्र बनाए थे। इसमें से एक पेंटिंग आज भी स्टेट म्यूजियम में रखा हुआ है। नवाब आसफुददौला ने अपनी राजधानी लखनऊ को बनाया, तो उनके शासन काल में मिहिरचंद के समकालीन बहादुर सिंह भी लखनऊ आए और उन्होंने कई नायाब चित्र बनाएं।

पहचान बनी वो दो पेंटिंग्स
नवाब के अनन्य मित्र और दरबारी क्लाड मार्टिन ने सन् 1784 में ब्रिटिश पेंटर जान जोफेनो को लखनऊ में बुलाया जिसने कई शानदार पेंटिंग बनाई। लखनऊ के उसी दौर की कुछ पेंटिंग्स आज भी स्टेट म्यूजियम में लगी हुईं हैं।

और हां, भला उन दो महबूबा के पेंटिंग्स को कोई कैसे भूल सकता है जो अवध शैली की शान ही नहीं पहचान बने हुए है। बादशाह गाजीउद्दीन हैदर से लेकर जाने आलम के जमाने तक की जो पेंटिंग्स तैयार की गईं उनमें यूरोपियन शैली की छाप दिखती है।

शाहनजफ लखनऊ में लगे हुए दो खूबसूरत चित्र और स्टेट म्युजियम में रखे हुए दो नाजनीनो की पेंटिंग्स उसकी मिसाल है। बात अगर वाजिद अली शाह के दौर की करें तो उस दौर के चित्रों में कैसरबाग के रास रहस तथा परीखाने का दृश्यांकन अधिक है।

उस समय अवध दरबार के जाने-माने चित्रकारों में गजराज सिंह, आसफ अली प्रमुख थे। यह कहना गलत नहीं होगा कि अवध की चित्रकला एक अलग पहचान रखती है लेकिन इसमें अलग-अलग शैलियों का पुट भी भरपूर मिलता है।
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लिखा तो यह भी जाना चाहिए कि जो असर अवधी चित्रकारी में है वह दुनिया में और कहीं नहीं मिलेगी।
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