40 साल बाद इतिहास अपने आप को दुहरा रहा है। तब बलराज मधोक को जनसंघ की राजनीति से हाशिए पर डालकर वनवास का रास्ता अपनाने को मजबूर कर दिया गया था।
इस बार लालकृष्ण आडवाणी के लिए कुछ वैसी ही भूमिका तैयार कर दी गई है।
संयोग यह भी है कि आज हाशिए पर पहुंचा दिए गए आडवाणी ही मधोक के हाशिए पर जाने का कारण बने थे।
अब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी आडवाणी के वनवास का कारण बन गए। यहां ध्यान में रखने वाली बात यह भी है कि मधोक व आडवाणी दोनों को अपने कनिष्ठों के हाथों मात मिली। मोदी कभी आडवाणी के सहायक की भूमिका में रहा करते थे तो आडवाणी भी मधोक के साथ ऐसी भूमिका थी।
ऐसा लगता था कि घड़ी की सुई घूम फिरकर फिर उसी स्थान पर टिक गई हैं, जहां 1971 से 1973 के बीच थी। फर्क सिर्फ इतना है कि मधोक को वनवास का रास्ता अपनाने को लोकसभा चुनाव बाद बाध्य होना पड़ा था। आडवाणी को वह रास्ता इस बार लोकसभा चुनाव से पहले दिखा दिया गया है।
बात मधोक की
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक पुराने प्रचारक बताते हैं कि कारण तो याद नहीं आता लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी व बलराज मधोक के बीच 36 का रिश्ता हमेशा सुर्खियों में रहा। मधोक, अटल को सिद्धांतों से समझौता करने वाला नेता बताते थे।
वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ को मिली पराजय ने इन रिश्तों में और तल्खी घोल दी। मधोक ने अटल पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरागांधी से मिले होने का आरोप लगाया। संघ की तरफ से ऐसे आरोप न लगाने की हिदायत मिली।
चेतावनी दी गई कि सब पर हमला करो लेकिन अटल पर नहीं। पर, मधोक नहीं माने। वर्ष 1973 में भारतीय जनसंघ का अधिवेशन कानपुर में हुआ। यहां जनसंघ के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होना था। अटल के आग्रह पर संघ ने आडवाणी को जनसंघ की बागडोर सौंपने का फैसला किया।
मधोक विरोध में अड़ गए। संघ ने मधोक का विरोध दरकिनार रखते हुए आडवाणी को अध्यक्ष बनवाया। मधोक को जनसंघ की राजनीति में हाशिए पर डाल दिया गया। मधोक को पार्टी से ही नाता तोड़ देना पड़ा।
मधोक के वनवास का कारण बने आडवाणी पार्टी से अलग होने की सीमा तक जाएंगे या नहीं, इसका जवाब भविष्य में मिलेगा। पर, हालात कुछ उसी तरह के बन गए हैं।
सब कुछ वैसा ही
बलराज मधोक के करीबी रहे एक प्रसिद्ध आयुर्वेद चिकित्सक बताते हैं कि जिस तरह आज आडवाणी के सामने संघ और मोदी एक साथ खड़े हुए हैं। कुछ उसी तरह मधोक के सामने संघ और आडवाणी खड़े हुए थे। तथ्य रोचक भी है और भगवा खेमे की रीतिनीति की सच्चाई खोलने वाला भी। मामला संगठन मंत्रियों की भूमिका व उपयोगिता का था।
जिस तरह संगठन मंत्रियों की उपयोगिता और भूमिका तथा उनके व्यवहार पर भाजपा के भीतर समय-समय पर कई सवाल उठते रहे हैं।
कुछ वैसी ही स्थिति 1968 से 1970 के बीच बन गई थी। तब मधोक ने संगठन मंत्रियों के रीतिनीति व कार्यव्यवहार पर अंगुली उठाते हुए जनसंघ को संगठन मंत्रियों की छाया से मुक्त करने का आग्रह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से किया। तर्क दिया कि जनसंघ को स्वतंत्ररूप से हिंदुत्व की राजनीति करने दी जाए।
संगठन मंत्रियों के कारण पार्टी के पदाधिकारी दल के हित में और राजनीतिक लक्ष्यों को ध्यान में रखकर काम नहीं कर पाते हैं। लालकृष्ण आडवाणी ने मधोक की बात का विरोध करते हुए संघ का साथ दिया।
गोलवलकर के पद चिह्नों पर भागवत
संघ के क्षेत्र प्रचारक रह चुके एक अन्य प्रचारक बताते हैं कि भाजपा को लेकर इस समय जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है लगभग वैसी चुनौतियां तब सामने आयी थीं जब अटल बिहारी वाजपेयी को जनसंघ की राजनीतिक कमान सौंपने का फैसला हुआ था। मधोक ने तब भी विरोध किया था।
तत्कालीन सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ‘गुरुजी’ की तरफ से उस समय जम्मू से लेकर दिल्ली तक आने वाले क्षेत्र संघ रचना के लिहाज से पंजाब प्रांत के प्रचारक माधवराव मूले के माध्यम से मधोक को यह संदेश भिजवाया गया कि जनसंघ अब अटल की अगुवाई में ही आगे बढ़ेगा।
इस फैसले पर पुनर्विचार संभव नहीं है। जिन्हें यह पसंद नहीं है उन्हें अपनी नई भूमिका का फैसला खुद कर लेना चाहिए। उसी तरह की बात आडवाणी कुछ ऐसा ही कठोर संदेश इस बार मोहन भागवत ने दिया है।