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योगी सरकार के एक साल पर रिपोर्ट कार्ड: साख तो बढ़ी पर बाकी रहे कुछ सवाल

Sun, 18 Mar 2018 02:07 AM IST
अखिलेश वाजपेयी / राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : amar ujala
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एक साल में यूपी में काफी कुछ नया हुआ है। पुलिम महकमे की हनक लौटी, तुष्टीकरण का दौर थमा और बड़े पदों पर साफ छवि के लोग नियुक्त हुए। बुंदेलखंड में सरकार संकल्प के साथ आगे बढ़ती नजर आई। हालांकि चुनौतियां अभी मुंह बाए खड़ी हैं। योजनाएं धरातल पर दिखनी शुरू नहीं हुईं हैं, लिहाजा बेसब्री भी बढ़ी। साल पूरा होने से ऐन पहले सूबे के मुखिया को अपने घर से ही सबक मिल गया। किसान उम्मीदों से देख रहे हैं। सरकारी महकमे और अफसरों का रवैया बदला नहीं है। साख बचाने और काम दिखाने के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है...

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वर्ष पहले... 18 मार्च को दोपहर उतरते-उतरते जब यह खबर मिली कि 14 वर्षों के वनवास के बाद सत्ता में लौटी भाजपा ने भगवा वेषधारी संन्यासी गोरखपीठ के महंत योगी आदित्यनाथ को यूपी का राजकाज सौंपने का फैसला किया है तो साफ हो गया कि वक्त काफी बदल गया है। भाजपा पर लोग भले ही राजनीति के भगवाकरण का आरोप लगाते हों, लेकिन एक संन्यासी को सत्ता सौंपकर यह संदेश दिया कि भाजपा ने धर्मतंत्र के नियंत्रण में राजतंत्र को चलाने का फैसला किया है। यह सरकार पूर्व की सपा व बसपा सरकारों से अलग होगी। सरोकारों पर संवेदनशीलता, समाज के प्रति समर्पण, सेवा, सम्मान और समस्याओं के तुरंत समाधान के संकल्प के साथ काम करेगी।

सरकार इस दिशा में चली भी। काम शुरू हुए। एक साल के दौरान सरकार के सामने कई सवाल आए। समस्याएं भी आईं। सरकार ने समाधान किए, शासन को सरोकारी बनाने के प्रयास भी हुए। संकल्प पत्र के प्रति समर्पण का संदेश दिया गया। एजेंडे का ख्याल रखा गया। हिंदुत्ववादी सरकार के संदेश के साथ मुसलमानों का भी भरोसा हासिल करने की कोशिश हुई। कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भी सुधार की कोशिश हुई।
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सरकार की साख बनी पर, साल पूरा होते-होते गोरखपुर व फूलपुर के नतीजों ने साख और काम पर सवालों को व्यापक बना दिया। इस आशंका को सही साबित कर दिया कि सरकार के फैसलों और जनता में उनकी डिलीवरी के बीच बड़ी खाई है। अफसरों की मनमानी और पुलिस के गैर जिम्मेदाराना रवैये को लेकर सरकार के प्रति लोगों में कहीं न कहीं कुछ नाराजगी है। कुछ ऐसे सवाल है, जिन्हें सरकार समझ नहीं पाई है। लोगों को इन पर आने वाले दिनों में समाधान का इंतजार रहेगा। सरकार को समाधान करने के लिए प्रयत्न करना होगा अन्यथा चुनौती बढ़ेगी।

हिंदुत्व का स्पष्ट संदेश... तुष्टीकरण से परहेज

प्रदेश में सरकार का विधिवत गठन भी नहीं हुआ था कि स्लॉटर हाउस सील किए जाने लगे। शहरों से लेकर गांवों तक खुलेआम लगने वाली मीट की दुकानों ने सड़कों पर से अपना फैलाव समेट लिया। सरकार के औपचारिक फैसले के पहले ही पुलिस, भाजपा के संकल्प पत्र के वायदे एंटी रोमियो स्क्वॉयड के रूप में सक्रिय हो गई।

इतनी सक्रिय कि खुद मुख्यमंत्री को यह कहना पड़ा कि मर्जी से घूमने वाले लोगों को परेशान किया गया तो कार्रवाई होगी। मुख्यमंत्री ने नवरात्र पर मंदिरों को 24 घंटे बिजली और साफ सफाई का आदेश दिया तो लोगों को लगा कि बहुत कुछ बदल गया है। तीन तलाक पर सरकार की आक्रामकता दिखी।

अयोध्या में सरयू आरती, वाराणसी में देव दीपावली जैसे आयोजनों के अलावा मथुरा-वृंदावन में होली, नैमिषारण्य का विकास, चित्रकूट में मंदाकिनी की आरती और विकास, मुख्यमंत्री की कामद गिरि की परिक्रमा, नवरात्र पर कन्या पूजन, बजट में राम, कृष्ण, बुध और जैन सर्किट जैसी योजनाओं के लिए धन की व्यवस्था से सरकार का स्पष्ट संदेश दिया।

मुख्यमंत्री आवास से रोजा इफ्तार जैसे आयोजनों की विदाई, थानों में कृष्ण जन्माष्टमी मनाने का आदेश, हिंदुत्व के सरोकारों से जुड़े अन्य स्थलों के लिए नई सड़कों के काम और ‘मैं हिंदू हूं, ईद नहीं मनाता’ ‘मैं टोपी नहीं पहनता’ ‘साल में जुमा तो 52 बार आता है, लेकिन होली एक ही बार आती है, इसलिए नमाज का समय आगे बढ़ा लिया जाए’ जैसे बयानों ने भाजपा के उस संदेश पर मुहर भी लगाई कि वर्ग विशेष का तुष्टीकरण करने वाली सत्ता बदल चुकी है।

खासतौर से 15 से 25 वर्ष वाले नौजवानों के लिए तो वाकई यह बड़ा बदलाव था क्योंकि उन्होंने प्रदेश की सरकारों को अक्सर ईद व बकरीद मनाते और रोजेदारों को इफ्तारी कराते ही देखा था। जाहिर है कि सरकार एजेंडे पर अपनी साख मजबूत करने में कामयाब रही है।

कर्जमाफी सशर्त, गन्ना किसानों का भी बड़ा सवाल

- फोटो : amar ujala
भाजपा ने लघु एवं सीमांत किसानों के फसली ऋण को माफ करने का वादा किया था। सरकार बनी तो इस वादे को पूरा करने की राह में इतनी समस्याएं खड़ी हो गईं कि भाजपा के रणनीतिकारों को 17 दिन लग गए समाधान निकालने में। पहली कैबिनेट बैठक ही 17 दिन बाद हो पाई। सरकार ने कर्जमाफी का फैसला किया, पर सिर्फ एक लाख और मार्च 16 तक ही सीमा तय करके विपक्ष को आलोचनाओं का मौका दे दिया। आलू किसानों के मुद्दे पर भी सवाल उठे।

गन्ना किसानों के भुगतान को सरकार की शुरुआती तेजी ने वादों पर अमल के इरादों पर भरोसा जताया, लेकिन साल पूरा होते-होते लगभग 6500 करोड़ रुपये की भुगतान नहीं हो पाया। सरकार ने बिजली भुगतान पर सरचार्ज माफ करके, किसानों के 10000 रुपये से ज्यादा के बकाया बिजली बिलों के किस्तों में भुगतान की सुविधा देकर यह संदेश देने की कोशिश की कि अपने वादों सच करने के लिए संकल्पबद्ध है। पर, जिस तरह किसानों की बिजली के रेट बढ़े और अनमीटर्ड उपभोक्ताओं के फिक्स्ड दर बढ़ाई, और अब निजीकरण की तैयारी है, इससे सरकार के लिए नाराजगी बढ़ भी सकती है।

उपचुनाव में हार से उठे सवाल
इन्वेस्टर्स समिट के सफल आयोजन और तमाम किलेबंदी के बावजूद गोरखपुर व फूलपुर उपचुनाव में हार ने सरकार की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया। सरकार व भाजपा संगठन को इस हार ने कुछ सबक भी दिए हैं। यह भी कि पिछड़ों और दलितों की एकता भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजा सकती है। सबसे बड़ा सबक अति-आत्मविश्वास और विपक्ष को कम करके आंकने की थी, जिसे खुद सीएम ने भी स्वीकार किया।

बयानों से फिसले, फिर संभालने की रही आपाधापी

- फोटो : amar ujala
सरकार साख बनाने में जुटी रही तो बयान बहादुर तथा सरकारी मशीनरी के लोग अपनी शैली से उसके लिए समस्या खड़ी करते रहे। स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने गोरखपुर में बच्चों की मौत पर ‘अगस्त में मौतें ज्यादा होती है’ बयान देकर किरकिरी कराई तो कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर थानों में वसूली का रेट बढ़ने जैसे बयान देकर विपक्ष को मौका दिया।

कुछ जिलों में अधिकारियों के रवैये के चलते विधायकों ने धरने पर बैठकर सरकार की साख के लिए चुनौती खड़ी की। योगी ने यह सावधानी बरती थी कि सपा-बसपा की सरकारों की तरह भाजपा के लोग हनक दिखाकर जनता में छवि न बिगाड़ें। पर, उनकी मंशा पर पुलिस व सरकारी अफसरों से लेकर पार्टी के लोगों तक ने पानी फेरने की कोशिश की। मेरठ, गाजियाबाद, शाहजहांपुर, बरेली, इलाहाबाद कई जगह भाजपाइयों व पुलिस के बीच तनातनी हुई।

विधानसभा सदन में मिले सफेद पाउडर को खतरनाक पीईटीएन विस्फोटक बताने और पूरा मामला टांय-टांय फिस्स निकलने से सरकार की साख को चोट पहुंची। नौकरशाही ने खुद के बेकाबू होने का सुबूत आधी-अधूरी सुविधाओं के साथ सपोर्ट लाइफ सिस्टम एंबुलेंस का सीएम के हाथों लोकार्पण कराकर दे दिया। रही सही कसर, सीएम की फ्लीट में गड़बड़ एंबुलेंस भेजकर कर दिया।

तबादलों पर अंगुली उठी पर बची रही छवि

- फोटो : amar ujala
अधिकारियों के पूरे वर्ष भर तबादलों से भी अंगुली उठी, पर सरकार ने मुख्य सचिव और डीजीपी के पद पर अच्छी छवि वाले अफसरों को पोस्टिंग देकर अच्छा संदेश दिया। हालांकि प्रशासनिक पदों पर एक जाति विशेष के लोगों की अधिक तैनाती एवं पूर्वांचल व बिहार के खाते में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद जाने को लेकर सवाल भी उठे, लेकिन देर रात तक काम करने और कार्यालयों से ही काम निपटाने के निर्देश, विभागवार प्रजेन्टेशन तथा बैठकों ने सरकार के इरादों पर भरोसा भी पैदा किया।

अधिकारियों की कार्यप्रणाली और रवैया ई-गवर्नेंस के भी आड़े आया। कामों के समयबद्ध निस्तारण के दावे भी जमीन पर नहीं उतरे। अनेकों प्रयासों के बावजूद भर्ती बोर्डों के अध्यक्षों के चयन में सरकार मंथन ही करती रह गई। एक वर्ष पूरा होते-होते अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति कर नौकरियां देने का वादा पूरा करने का इरादा दिखाया, लेकिन अभी जमीन पर उस स्तर पर काम नहीं उतर पाया है, जिस तरह का वादा किया गया था।

रिवर फ्रंट घोटाले की न्यायिक जांच, फिर इसकी जांच सीबीआई को सौंपने व चीनी मिलों की बिक्री की उच्चस्तरीय जांच तथा एलडीए और आवास विकास परिषदों की सीएजी जांच कराने का ऐलान कर सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर रुख का संदेश दिया। पर, बच्चों के स्वेटर वितरण के काम में देरी ने सरकार के खिलाफ विपक्ष को इस मोर्चे पर सवाल उठाने का मौका भी दे दिया।
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सरकार के एक साल के कामकाज पर ये कहते हैं योगी आदित्यनाथ

- फोटो : amar ujala
एक साल में यूपी के बारे में धारणा बदली है। जो अंबानी, टाटा यूपी में निवेश न करने की कसम खा चुके थे, वे अब यहां हजारों करोड़ का निवेश करने आ रहे हैं। कैराना, कांधला से अब पलायन नहीं हो रहा है। पेशेवर अपराधियों को जहां जाना था वहां पहुंच गए हैं, जो बचे हैं वे सुधर कर सब्जी बेच रहे हैं या जूता पॉलिश कर रहे हैं।
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