दरअसल, प्रॉपर्टी खरीदने में अक्सर स्टांप चोरी की शिकायतें आती हैं। कई बार खरीदार वास्तव में प्रॉपर्टी की सही मालियत नहीं जानता है और वह विक्रेता या प्रॉपर्टी डीलर के बताए दाम पर खरीद लेता है। इस प्रक्रिया में स्टांप बचाने के लिए कीमतें कम-ज्यादा बताने का खेल चलता है।
ऐसे मामलों में शिकायत होने पर कई बार केस हो जाता है और प्रॉपर्टी भी फंस जाती है। बड़े पैमाने पर लंबित मुकदमों को देखते हुए नई व्यवस्था की गई है। नई व्यवस्था से स्टांप एवं रजिस्ट्री विभाग में ऐसे मुकदमों की संख्या पर अंकुश लगेगा।
अभी तक की व्यवस्था के मुताबिक, कोई व्यक्ति भूमि, भवन खरीदना चाहता था तो उस भू-संपत्ति का मूल्य कितना है, इस पर संशय बना रहता है और खरीदार प्रॉपर्टी डीलर, रजिस्ट्री करवाने वाले वकील, रजिस्ट्री विभाग के अधिकारी से संपर्क करता था। उसमें मौखिक तौर पर उस भवन या भूमि की कीमत तय हो जाती थी। उसी आधार पर उसकी रजिस्ट्री पर स्टांप शुल्क लगता था।
सौद के बाद भी विवाद, बढ़ते जा रहे थे मुकदमे
कई बार सौदे के बाद विवाद की स्थिति पैदा होती थी कि उक्त भू-संपत्ति की कीमत इतनी नहीं, बल्कि इतनी होनी चाहिए थी। इस लिहाज से इसकी रजिस्ट्री पर स्टांप शुल्क कम वसूला गया। प्रदेश के स्टांप व रजिस्ट्री विभाग में ऐसे मुकदमे बढ़ते जा रहे हैं।