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लविवि में लागू होगा नया पीएचडी अध्यादेश, महिला शोधार्थियों को मिलेंगी ये सुविधाएं

Sat, 20 Oct 2018 02:46 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : डेमो
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आईआईटी की तरह इस साल से यूजीसी ने महिलाओं को शोध की तरफ आकर्षित करने के लिए नई व्यवस्था दी है। इसके अनुसार अब महिला शोधार्थी अपनी पीएचडी किसी अन्य विश्वविद्यालय में ट्रांसफर करा सकेंगी। लखनऊ विश्वविद्यालय की महिला शोधार्थियों को भी यह सुविधा मिलेगी।

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यहां जल्द ही नया पीएचडी अध्यादेश लागू होने जा रहा है। इसके लिए कार्य परिषद और विद्या परिषद की आकस्मिक बैठक 22 अक्तूबर को आहूत की गई है। विवि से पीएचडी करने वालों में महिला शोधार्थियों की संख्या ज्यादा होती है। कई बार शोध के दौरान ही शादी हो जाने या किसी अन्य कारण से वे अपना शोध पूरा नहीं कर पाती थीं।

इसे देखते हुए राज्य विश्वविद्यालयों के लिए प्रभावी किए गए यूजीसी अध्यादेश- 2016 में यह व्यवस्था दी गई है। किसी अन्य आपात स्थिति में भी महिलाएं अपनी पीएचडी ट्रांसफर करा सकेंगी। हालांकि इसमें शर्त रहेगी कि इसका क्रेडिट उसी विवि को मिलेगा, जहां से छात्रा ने प्रवेश लिया होगा। 
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उसकी डिग्री में संबंधित विश्वविद्यालय का ही नाम और विषय अंकित होगा। वहीं इसी साल से महिला शोधार्थियों को 240 दिन के मातृत्व अवकाश का भी लाभ प्रस्तावित किया गया है। अभी तक शोध पूरा करने की न्यूनतम समय सीमा तीन साल और अधिकतम छह साल है। ऐसे में अब छात्राएं अधिकतम आठ साल में भी अपनी पीएचडी पूरी कर सकेंगी। बता दें कि विश्वविद्यालय प्रशासन यूजीसी के नए शोध अध्यादेश को हूबहू स्वीकार करने जा रहा है। 

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माह के अंत में शुरू होंगे आवेदन

डेमो
शोध के नए नियमों में दिव्यांग विद्यार्थियों को भी छूट दी गई है। इसके अनुसार 40 फीसदी से अधिक दिव्यांग विद्यार्थियों को भी अपनी पीएचडी पूरी करने के लिए दो साल का अतिरिक्त समय मिलेगा। वे भी अपना शोध अधिकतम आठ साल में पूरा कर सकेंगे। कई बार दिव्यांग विद्यार्थी भी विभिन्न कारणों से निर्धारित समय में शोध पूरा नहीं कर पाते थे।

विश्वविद्यालय में दो साल से पीएचडी आवेदन लंबित हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय इस बार जल्द से जल्द प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी में है। एकेडमिक व कार्य परिषद से एप्रूवल मिलने के बाद इस महीने के अंत में ही विश्वविद्यालय प्रशासन आवेदन शुरू करने की तैयारी में है।

तिथियों पर मुहर परिषद की बैठक में लग सकती है। दो साल से प्रवेश न होने से कुछ विद्यार्थियों का नुकसान हुआ तो कुछ दूसरे विश्वविद्यालयों में चले गए। इस बार भी सत्र की शुरूआत में इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी। इसलिए कुछ विद्यार्थी अन्य विश्वविद्यालयों में जा चुके हैं।
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