हर एक्टर पॉपुलर होना चाहता है, मेरा भी बचपन से यही ख्वाब था। मैंने यह कभी नहीं कहा कि मैं यहां इंडस्ट्री में कला की सेवा करने आया हूं।
सच तो यह है कि मैं मशहूर होने, लड़कियों से मिलने-जुलने और वगैरह-वगैरह के लिए आया। ये खुलासा किया वेटरन एक्टर नसीरुद्दीन शाह ने।
मौका था उनकी किताब ‘नसीरुद्दीन शाह एंड देन वन डे-अ मेमॉयर’ के विमोचन का। मंगलवार को होटल क्लार्क अवध में नसीर अपनी बुक के रिलीज के लिए मौजूद थे।
नसीर ने बताया, लोग मेरे पास आते हैं कि सर आपके ग्रुप में शामिल होना है। मैं उनसे कहता हूं कि आप खुद कुछ ऐसा बेहतर करो कि बस मजा आ जाये।
फिर आपको मैं प्रोड्यूस करूंगा। वे पिछड़ जाते हैं। 20 साल से मैं लोगों को ऐसा चैलेंज देता आ रहा हूं.., लेकिन अब तक किसी ने स्वीकार नहीं किया है।
जानें क्यों लिखी नसीर ने ऑटो बायोग्राफी
अपनी बायोग्राफी लिखने की वजह का खुलासा करते हुए नसीर ने बताया, ‘मैं एक बहुत ही बोरिंग फिल्म में काम कर रहा था और बस बोरियत दूर करने के लिए मैंने किताब लिखने के बारे में सोचा।’
हालांकि ये किताब सितंबर में रिलीज हो चुकी है। और शाह के बेबाक खुलासों को लेकर ये किताब काफी चर्चित भी हो चुकी है।
इवेंट में मौजूद लोग तब हैरत में आ गए जब नसीर ने कहा, मेरे पास किताब पब्लिश कराने के लिए पैसा था और मैं अपनी याद्दाश्त परखना चाहता था, इसलिए मैंने अपनी ऑटोबायोग्राफी लिखने का फैसला लिया।
मुख्य अतिथि आलोकर रंजन ने इस बात पर खुशी जताई कि इतना अच्छा साहित्य लखनऊ महोत्सव में साहित्य-कला, संस्कृति के चाहने वाले शहरियों के सामने आया।
फिल्मों के गिरते स्तर पर बोले नसीर
अपनी एक्ट्रेस वाइफ रत्ना पाठक शाह के साथ पहुंचे नसीर ने शाही अंदाज में अपने काम और जिंदगी पर रोशनी डाली। दर्शकों में कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने उनके साथ काम किया था। कुछ ऐसे थे जो उनके परिवार को नजदीकी से जानते थे और कुछ उनके बच्चों के टीचर रह चुके थे।
बाराबंकी में जन्मे नसीर लखनऊ के एक कॉन्वेंट स्कूल के स्टूडेंट रह चुके हैं। नसीरुद्दीन शाह ने भारतीय फिल्मों के गिरते स्तर को लेकर पूछे एक सवाल के जवाब में कहा, भारतीय फिल्में आज भी पाषाण युग की ही तरह बन रही हैं।
हां, एक फिल्मकार हैं राजकुमार हिरानी जो कॉमर्शियल सिनेमा के माध्यम से ही सही, लेकिन मैसेज देने वाली फिल्में बना रहे हैं, जो औरों से हटकर हैं।
जब ठानी मिर्जा गालिब बनने की जिद...
गुलजार साबह मिर्जा गालिब बना रहे थे आर उस वक्त के दो बड़े नाम संजीव कुमार, दिलीप कुमार दोनों ही खुद को अपने जेहन में मिर्जा मानकर चल रहे थे।
तब मैंने ठान लिया कि मैं ये रोल करके ही मानूंगा। मैंने भी गुलजार साहब को फिल्म इंस्टीट्यूट से लिख डाला। खैर इधर, संजीव कुमार जी भी बीमार पड़ गए।
उसके बाद गुलजार जब सामने पड़े तो मैंने कह दिया कि ‘मिर्जा गालिब का रोल मैं ही करूंगा, किसी और को करने नहीं दूंगा। पैसे भी उतने ही लूंगा, जितने किसी को मिल रहे होंगे।’
सुनते ही वह भी बोल पड़े कि मुझे मेरा गालिब मिल गया। मैंने अच्छा किया क्योंकि उसकी स्क्रिप्ट अच्छी थी। वैसे मिर्जा के लिए फारुख शेख, पंकज कपूर को भी गुलजार साहब अप्रोच कर रहे थे।