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सिर्फ मुलायम की उपेक्षा ही नहीं, नरेश अग्रवाल भी बने सपा से वाजपेयी के इस्तीफे की वजह

Thu, 10 Aug 2017 02:25 AM IST
ब्यूरो/अमर उजााल, लखनऊ
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डॉ. अशोक वाजपेयी - फोटो : amar ujala
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पूर्व मंत्री व सपा के वरिष्ठ नेता डॉ. अशोक वाजपेयी ने भले ही पार्टी में मुलायम सिंह यादव की  उपेक्षा को विधान परिषद की सदस्यता से त्यागपत्र की वजह बताया हो, पर इसकी एक बड़ी वजह सपा के राज्यसभा सदस्य नरेश अग्रवाल भी हैं। नरेश पहले मुलायम के साथ थे, लेकिन अखिलेश यादव और प्रो. रामगोपाल यादव के पार्टी पर कब्जा करने के बाद अब इस खेमे के साथ हैं। नरेश की डॉ. वाजपेयी से खींचतान काफी लंबे समय से रही है।
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सपा में नरेश का प्रभाव बढ़ने के बाद डॉ. वाजपेयी को न सिर्फ पार्टी में, बल्कि हरदोई में भी पार्टी की राजनीति में हाशिए पर डालने की कोशिश होती रही। भले ही वाजपेयी ने अगले राजनीतिक कदम के बारे में समर्थकों से बातचीत करके कोई फैसला करने की बात कही है, पर पृष्ठभूमि और समीकरणों को देखते हुए इनका भी भाजपा में जाना लगभग तय है। माना जाता है कि सपा के अभी कुछ और एमएलसी इस्तीफा देंगे।

उच्च सदन में घट रही सपा सदस्यों की तादाद
पहले सपा एमएलसी बुक्कल नवाब और यशवंत सिंह ने इस्तीफा दिया। इसके बाद डॉ. सरोजिनी अग्रवाल ने विधान परिषद की सदस्यता से त्यागपत्र दिया। बुधवार को डॉ. अशोक वाजपेयी और अंबिका चौधरी ने इस्तीफा दिया। बसपा से जयवीर सिंह त्यागपत्र दे चुके हैं।
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परिषद में सपा की तादाद लगातार घट रही है। उसके सदस्यों की संख्या अब 61 रह गई है। इसके बावजूद उच्च सदन में सपा सबसे बड़ा दल है। बसपा के 9, भाजपा के 8, कांग्रेस के 2, रालोद का 1, शिक्षक दल के 5, निर्दलीय समूह के 5, निर्दलीय एक सदस्य हैं। एक सदस्य असंबद्ध हैं।

अंबिका के सामने बचा था कोई विकल्प

अंबिका चौधरी तकनीकी रूप से अब भी विधान परिषद में सपा के सदस्य थे, पर विधानसभा चुनाव के दौरान ही सपा छोड़ बसपा में शामिल हो गए थे। चौधरी ने भी तब पार्टी में मुलायम की उपेक्षा को सपा छोड़ने का कारण बताया था।

चौधरी का कार्यकाल मई 2018 तक ही था। साथ ही सपा ने दल बदल पर उनके खिलाफ परिषद की सदस्यता रद्द करने की याचिका भी विधान परिषद के सभापति के यहां दायर थी। इस पर जल्द ही फैसला होने के संकेत थे। इसमें अंबिका की सदस्यता जा सकती थी। ऐसे में अंबिका के सामने त्यागपत्र देने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था।

यही नहीं, अंबिका के सामने भाजपा में जाने का विकल्प भी बहुत आसान नहीं है। कारण, उन्हें लगातार दो बार हराकर विधानसभा पहुंचे और अब स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री उपेंद्र तिवारी को भाजपा नेतृत्व का वरदहस्त प्राप्त है। तिवारी को मंत्री पद ही अंबिका को हराने के पुरस्कारस्वरूप मिला है। ऐसे में अंबिका भाजपा में कैसे जाते। लिहाजा उन्होंने बसपा में ही खुश रहने की बात कही।
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इस तरह वाजपेयी की हो रही थी उपेक्षा

छात्र आंदोलन से निकले हरदोई के डॉ. अशोक वाजपेयी आपातकाल के खिलाफ आंदोलन में जेल भी गए। वह 1977 में पहली बार विधायक बने। इसके बाद कई बार विधायक तथा मंत्री रहे। पर, सपा में नरेश अग्रवाल के प्रवेश के बाद उनको किनारे किया जाता रहा।

वर्ष 2014 में डॉ. वाजपेयी को सपा ने लखनऊ लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया था, पर बाद में उनका टिकट काट दिया गया। टिकट कटने से दो दिन पहले सपा के वरिष्ठ नेता आजम खां ने यह कहते हुए नरेश पर निशाना भी साधा था कि हमारी ही पार्टी के एक सज्जन को वाजपेयी से बड़ी हमदर्दी है। उनके कारण वाजपेयी को हरदोई से लखनऊ आना पड़ा। वह दुआ करते हैं कि उनके दोस्त वाजपेयी लखनऊ में चुनाव लड़ने में सफल हो जाएं।

आजम की इस बात के बाद जब डॉ. अशोक वाजपेयी का टिकट काटकर अभिषेक मिश्र को मैदान में उतारा गया तो सभी की समझ में आ गया कि इस सबके पीछे कौन था। ऊपर से जब मुलायम के हाथ से पार्टी निकल गई, तब से वाजपेयी की और अधिक उपेक्षा हो रही थी।

विधान परिषद की 7 सीटें खाली
विधान परिषद की इस समय 7 सीटें खाली हैं। इनमें 6 सीटें विधानसभा क्षेत्र की और एक स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र की है। विधान परिषद की 5 सीटें सपा और एक सीट बसपा सदस्य के इस्तीफे से खाली हुई हैं। स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र की बदायूं सीट बनवारी सिंह यादव के इस्तीफे से रिक्त चली आ रही है।

भाजपा को सीएम, दो डिप्टी सीएम व दो मंत्रियों को किसी सदन का सदस्य बनाने के लिए पांच सीटों की जरूरत थी। अब 7 सीटें खाली हो गई हैं। हालांकि विधानसभा क्षेत्र की 6 सीटों पर चुनाव होगा तो भाजपा पांच सीटें तक जीत सकती है। एक सीट विपक्ष के खाते में जाएगी।
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