तेवरों में तल्खी और फैसले लेने में नरमी, अखिलेश सरकार के मंत्रियों की बैठक में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव का यह रुख यूं ही नहीं है।
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विधानमंडल सत्र, उपचुनाव और संगठन के पुनर्गठन का लक्ष्य सामने होने के कारण वे कड़े फैसले लेने से बच रहे हैं। सपा नेतृत्व मान रहा हैं कि लोकसभा चुनाव में करारी हार के लिए मंत्री अकेले जिम्मेदार नहीं हैं।
पूरब से पश्चिम तक एक जैसे वोटिंग पैटर्न की वजहें कुछ और भी हैं। मुलायम सिंह यादव ने 15 जून को मंत्रियों की आपात बैठक में शुरुआत में बेहद कड़े तेवर दिखाएं, उन्हें जमकर फटकार लगाई।
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उन्हें बता दिया, वे जो कुछ कर रहे हैं, इसकी उन्हें पूरी जानकारी है। भ्रष्टाचार, ठेके और जमीनों के खेल की भी। इतना सब कुछ होने के बावजूद उन्होंने न तो किसी मंत्री का इस्तीफा मांगा और न ही कच्चे चिट्ठे वाले किसी मंत्री का नाम उजागर किया।
सियासी हालात भी हैं एक वजह
सपा के कई नेता मानते हैं कि नेताजी जब पार्टी की आंतरिक बैठकों में बोलते हैं तो उनकी भूमिका घर के बुजुर्ग और संरक्षक जैसी होती है। समाजवादी परिवार के मुखिया की हैसियत से वे खरी-खरी बातें बोलते हैं लेकिन उनका दिल वाकई मुलायम रहता है।
वे जानकारी होने के बावजूद कई बातों को नजरअंदाज करते हैं। इशारे ही इशारों में बहुत कुछ कह भी देते हैं। कड़े फैसले लेने में संकोच नहीं करते लेकिन सियासी हालात को भी बखूबी भांप जाते हैं।
ऐसा समझा जा रहा है कि मौजूदा राजनीतिक हालात में सपा नेतृत्व सरकार के कामकाज के तौर तरीकों में बदलाव भी चाहता है और बड़े फैसले भी नहीं लेना चाहता।
पार्टी में बढ़ सकती है उठापटक
गौरतलब है कि करारी हार से सपा के कारकूनों में मायूसी है। विरोधियों के हमले जारी हैं। भाजपा बसपा कानून व्यवस्था को मुद्दा बना रही हैं। ऐसे में मंत्रियों को हटाने या दूसरे कड़े फैसले से पार्टी में उठापटक बढ़ेगी।
विरोधी दलों को सपा के खिलाफ एक और मुद्दा मिलेगा। इसी को देखते हुए नेताजी ने कड़ा रुख अपनाकर नरमी भी दिखाई।
सपा नेतृत्व की सोच है कि कड़े फैसले लेने के बजाय सरकार के कामकाज में सकारात्मक परिवर्तन से ही मोदीमय माहौल को फिर से अपने पक्ष में किया जा सकता है।
औचक निरीक्षण समेत कई फैसले लेकर सरकार के कामकाज में बदलाव की शुरुआत सीएम अखिलेश यादव ने की है। उन्होंने दूसरे मंत्रियों को यही ढर्रा अपनाने का संदेश भी दे दिया है।
ये हैं प्रमुख चुनौतियां
सपा के सामने इस दिनों कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हुई हैं। सदन के भीतर भी बाहर भी। 19 जून से विधानमंडल का सत्र है। बदायूं में गैंग रेप और मर्डर, भाजपा नेताओं की हत्याएं, गन्ना मूल्य भुगतान, बिजली संकट समेत कई मुद्दों पर विपक्षी दल इस बार हाउस में ज्यादा आक्रामक रहेंगे।
सदन के तत्काल बाद उपचुनाव की तैयारियां शुरू हो जाएंगी। विधानसभा की 12 और लोकसभा की एक सीट पर होने वाले उपचुनाव से सपा को काफी उम्मीदें हैं। सपा नेतृत्व का आकलन है कि उपचुनाव में बेहतर प्रदर्शन न केवल कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाएगा, वरन जनता में सपा का जलवा कायम रहने का संदेश भी देगा।
विधानसभा की जिन सीटों पर उप चुनाव हो रहे हैं उनमें से 11 भाजपा विधायकों और एक अपना दल विधायक के सांसद चुने जाने के कारण खाली हुई हैं। सपा के सूत्र बताते हैं कि ये विधानमंडल सत्र और उपचुनाव, दो बड़े टारगेट हैं, जिनके कारण नेताजी कड़े फैसले लेने से बच रहे हैं। तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए मंत्रिमंडल के पुनर्गठन का फैसला नहीं लिया गया।
चुनावी नतीजों के बाद सपा की प्रदेश, जिला इकाई और सभी प्रकोष्ठ भंग कर दिए गए हैं। सरकार का बेहतर संदेश देने के साथ ही संगठन का पुनर्गठन सपा की प्राथमिकता है। नेताजी हमेशा संगठन को तवज्जो देते हैं।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक सपा की कोशिश है कि संगठन में ऐसे लोगों को रखा जाए तो पार्टी की नीतियों के अनुरूप काम करें। चुनाव से पहले कई जिलाध्यक्षों पर तबादला, पोस्टिंग, ठेकों की राजनीति में शामिल होने के आरोप रहे हैं। सपा सरकार में बदलाव से पहले संगठन को दुरुस्त करना चाहती है।
गुटबंदी पर अंकुश लगाने की कवायद: सपा नेतृत्व को गुटबंदी पर अंकुश लगाने की कवायद भी करनी होगी। चुनाव के दौरान कई जिलों में मंत्री, विधायक, सांसद और जिलाध्यक्ष अलग-अलग खेमों में खड़े नजर आए।
उन्होंने प्रत्याशियों का विरोध तक किया। पार्टी सूत्र मानते हैं कि मंत्रियों पर कार्रवाई करके तात्कालिक तौर पर इस गुटबंदी को बढ़ावा मिल सकता था। मौजूदा हालात में पार्टी में ‘बागियों’ का खेमा बन जाने की आशंका थी। इसे रोकने के लिए भी मंत्रिमंडल में फेरबदल को टाला गया है।