समाजवादी पार्टी के मुखिया ने शुक्रवार और शनिवार को दो दिन तक अपने जन्मदिन का जश्न मनाया, वह भी पूरे शाही अंदाज में। मेजबानी भले ही आजम खां की थी, लेकिन समाजवाद का पूरा कुनबा रामपुर के चकाचौंध भरे जश्न और शाही स्वागत की खुमारी में डूबा हुआ था।
ये ऐसे समाजवाद का प्रशर्दन था, जिसे मुलायम के गुरु राम मनोहर लोहिया ने कभी ख्वाब में नहीं देखा था। यारों के यार मुलायम ने अपनी दोस्त आजम की बात मानने के लिए ही सही, पर जिस ऐतिहासिक स्वागत समारोह में शिरकत की, जिस तरह 75 फीटा केक काटा, ज्यों विक्योरिन बग्घी की सवारी की...वह लोहिया के समाजवाद की आत्मा पर आघात जैसा था।
मुलायम जिस लोहिया के आदर्शों पर चलने की बात कहते हैं, जिनके नाम पर यूपी में सत्तासीन होते हैं, उनकी ही बातें बड़ी आसानी से भुला देते हैं।
ब्रिटिश राजशाही का प्रतीक रही विक्टोरियन बग्घी में सवार होकर रामपुर की जनता से अपनी जयकार सुनने के बाद करीब पांच दशक से राजनीति कर रहे मुलामय शायद भूल गए होंगे कि लोहिया ने सप्तक्रांति का मंत्र दिया था। यहां उन्हीं सात बातों का जिक्र करते हैं, जो लोहिया के जीवनमूल्य थे लेकिन मुलायम की जिंदगी में वे कहीं नजर नहीं आए। वो सात सच, जो लोहिया के लिए उनके एक शिष्य का धोखा हैं।
1. स्वदेशी पढ़ाई और अंग्रेजी का विरोध
देश के महान समाजवादी चिंतक और स्वतंत्रता सेनानी राममनोहर लोहिया स्वदेशी के धुर समर्थक थे। जीवनभर उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं को इस्तेमाल करने की बात कही। अंग्रेजी भाषा का विरोध करते हुए उन्होंने कहा था कि यह औपनिवेशक शासकों की भाषा है।
लोहिया का मानना था कि भारत सिर्फ और सिर्फ अपनी भाषा के इस्तेमाल से ही तरक्की कर सकता है, लेकिन मुलायम ने बेटे अखिलेश यादव को पढ़ाई के लिए विलायत भेजा। अखिलेश ने ऑस्ट्रेलिया से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। जाहिर है, ऑस्ट्रेलिया में कोई भी हिंदी मीडियम का स्कूल नहीं रहा होगा।
विलायत से पढ़कर लौटे अखिलेश राजनीति में शामिल हुए, पापा के साथ संगठन का काम देखा और 2012 में सत्ता की साइकिल पर अखिलेश सवार हुए। पूरा समाजवादी कुनबा अखिलेश के पीछे चला। युवाओं की लहर में सत्ता का ऐसा सुख मिला, जिसकी शायद मुलायम ने भी कल्पना नहीं की थी।
हालांकि, लोकसभा चुनाव के पहले मुलायम को फिर स्वदेशी भाषा की बात याद आई। उन्होंने एक सभा में अंग्रेजी भाषा पर वार किया, लेकिन मीडिया ने सवाल किए तो मुलायम बैकफुट पर चले गए।
2. सरकारी स्कूलों की वकालत और विपक्ष
लोहिया ने हर स्तर पर समानता की बात की। उनका मानना था कि अगर हर वर्ग के बच्चों को शिक्षा में बराबर मौका देना है तो सभी को अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना चाहिए।
हालांकि, अगर विकीपीडिया पर मौजूद जानकारी को सही माना जाए तो मुलायम के परिवार में दूसरी और तीसरी पीढ़ी का कोई भी सदस्य अगर सरकारी स्कूल में गया तो सिर्फ फीता काटने। जानकारी के मुताबिक, दूसरी और तीसरी पीढ़ी के किसी भी युवा ने प्राइमरी स्तर पर सरकारी स्कूल में टाट और बेंच पर बैठकर पढ़ाई नहीं की।
3. लोहिया ने जीवनभर विपक्ष में बैठना पसंद किया। कांग्रेस का वैचारिक और राजनैतिक विरोध हमेशा उनकी राजनीति के केंद्र में रहा। यहां तक कि जब देश जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस के इतर सोच भी नहीं सकता था, तब भी लोहिया ने अपने अकेले के दम पर विपक्ष का वजूद बनाए रखा।
इसका ही नतीजा था कि कांग्रेस को कई राज्यों में शिकस्त का सामना करना पड़ा। इसके ठीक उलट, मुलायम ने सुविधा की राजनीति की। गठजोड़ की राजनीति के तहत उन्होंने कांग्रेस सरकार को लगातार एक दशक तक समर्थन दिया।
4. समान अधिकारों की लड़ाई और मुलायम
लोहिया का मानना था कि अगर समाज में आर्थिक समानता नहीं है, तो कोई भी दूसरी तरह की समानता बेमानी है। लोहिया की सादगी का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि जब लोहिया की मृत्यु हुई, उनके पास दौलत या प्रॉपर्टी के नाम पर कुछ भी नहीं था।
इसके ठीक उलट, मुलायम पर आय से ज्यादा संपत्ति रखने के आरोप लगे और सीबीआई जांच भी बैठी। मुलायम पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। सपा सरकार को भी सबसे भ्रष्ट सरकार का तमगा मिला। ये तमगा किसी राजनेता या विपक्षी दल से ज्यादा उस जनता ने दिया, जिस पर मुलायम ने राज किया।
5. लोहिया ने जीवनभर पुरुष और स्त्री के बीच किसी भी तरह के भेदभाव का विरोध किया। वे हमेशा महिला अधिकारों के लिए खड़े रहे और उनका सम्मान करने की वकालत करते रहे।
हालांकि, जब देश में बलात्कारियों के खिलाफ सख्त कानून की बात उठी और ऐसे नियम बनाए गए तो मुलायम ने इसका विरोध किया। उन्होंने एक सभा में यहां तक कह दिया कि अगर लड़कों से गलती हो जाए तो इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया जाए।
6. फिजूलखर्च के सख्त विरोधी थे लोहिया
लोहिया, बेवजह खर्च के सख्त खिलाफ थे। एक बार जब फिजूल खर्च की बात उठी, तो उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी नहीं बख्शा था।
नेहरू पर निशाना साधते हुए लोहिया ने कहा था कि जहां एक तरफ भारत की आबादी का एक बड़ा तबका तीन आने प्रति दिन पर गुजारा कर रहा है, वहीं नेहरू का एक दिन का खर्च 25 हजार रुपये था।
दूसरी तरफ, मुलायम के जन्मदिन समारोह पर हुए खर्च का अंदाजा सिर्फ इस बात से ही लगाया जा सकता है कि बग्घी लंदन से मंगाई गई और 75 फीट का केक दिल्ली के एक मशहूर बेकर ने रामपुर में रहकर मंगाया। बाकी फिल्म इंडस्ट्री से दो मशहूर गायक भी पहुंचे। इसके अलावा, सजावट, शान और स्वागत में जो खर्च हुआ वो अलग।
सबसे दिलचस्प बात तो ये कि मुलायम ने अपने जन्मदिन के भाषण में कहा कि ऐसा सम्मान सदियां याद रखेंगी। आजम के इस सम्मान समारोह को उन्होंने ऐतिहासिक करार दे दिया।
7. जातिगत राजनीति के विरोध में थे लोहिया
देश में जाति प्रथा को समाप्त करने और असमानता की सोच को मिटाने के लिए लोहिया ने रोटी और बेटी का नारा दिया। उनका मानना था कि अगर जाति के आधार पर होने वाले भेद को खत्म करना चाहिए तो सभी जाति के लोगों को एक साथ बैठकर खाना चाहिए।
इसके अलावा, लोहिया ने अंतर्जातीय विवाह को भी प्रोत्साहित किया। अब जरा मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक जीवन पर नजर डालिए। साफ नजर आएगा कि उनकी सत्ता की डगर ही जाति से जुड़ी हुई है।
मुलायम ने हमेशा जातिगत राजनीति की और उसके दम पर ही सत्ता में पहुंचे। सरकार, प्रशासन और पुलिस में एक विशेष जाति के लोगों की पोस्टिंग पर कई बार सवाल भी किए गए पर मुलायम का अंदाज नहीं बदला। बस मुलायम ने एक धर्म विशेष को भी अपनी राजनीति के केंद्र में रख लिया। वह हैं मुस्लिम। उसकी बड़ी वजह आजम भी हैं।
(साभार:dailyo.in)