लखनऊ। प्रकृति, कृषि और पर्यावरण सरंक्षण का प्रतीक पर्व हरेला बुधवार को राजधानी में भी मनाया गया। यह खास तौर पर उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में मनाया जाता है।
लखनऊ में पर्वतीय समाज के लोगों ने सुबह भगवान शिव-पार्वती की पूजा की। इसके बाद दस दिन पहले टोकरी व गमलों में बोए अनाज को काटा और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना की। कई परिवारों ने पौधरोपण कर हरियाली को बचाने का संदेश दिया।
उत्तराखंड महापरिषद लखनऊ के अध्यक्ष हरीश चंद्र पंत, संयोजक दीवान सिंह अधिकारी और महासचिव भरत सिंह बिष्ट की ओर से अपील की गई कि एक पौधा मां के नाम अभियान से जुड़कर प्रकृति के इस पर्व को हम सार्थक बना सकते हैं।
पर्वतीय महापरिषद के महासचिव महेंद्र सिंह रावत ने बताया कि सावन की संक्रांति से दस दिन पहले घरों में दो टोकरियों में सात प्रकार के अनाज बोते हैं। एक टोकरी को भगवान शिव और दूसरी को मां पार्वती का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। संक्रांति के दिन इन अनाजों को काटा जाता है।
सुंदरपाल सिंह बिष्ट ने बताया कि हमारे परिवार में वर्ष में तीन बार हरेला पर्व मनाया जाता है। एक सावन में प्रकृति को समर्पित पर्व मनाते हैं, फिर दोनों पर्व नवरात्र में भी मनाए जाते हें। तीनों बार ही पांच प्रकार के अनाज बोते हैं। दसवें दिन पूजन के साथ अनाज काटा जाता है।
गोमतीनगर के विनीतखंड में रहने वाले गोविंद बोरा ने परिवार के सदस्यों पूनम बोरा, किशन और राधिका के साथ हरेला पर्व पर पूजन किया। उन्होंने कहा कि यह पर्व हमें प्रकृति से प्रेम करने की सीख देता है।