तीन चुनावों में लगातार हार के बाद बसपा काडर जब पार्टी सुप्रीमो मायावती से संघर्ष के रास्ते पर चलकर पार्टी को खड़ा करने की उम्मीद कर रहा था, उन्होंने शॉर्टकट रास्ता अपना लिया।
मायावती के किसी भी दल से हाथ मिलाने के लिए तैयार होने के एलान के बाद काडर के कान खड़े हो गए हैं। उसे बेस वोट बैंक के ही प्रभावित होने का खतरा दिखने लगा है।
राजनीतिक विश्लेषक भी बसपा में हो रहे नीतिगत बदलाव के अलग-अलग तरह से नफा-नुकसान देख रहे हैं। बसपा के एक कोऑर्डिनेटर कहते हैं कि गठबंधन करके चुनाव लड़ने से तीन चुनावों में कड़ी हार के बावजूद चट्टान की तरह जमा बेस वोट बिखरने का खतरा बढ़ जाएगा।
2012 और 2017 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी उम्मीद के हिसाब से सीटें नहीं जीत पाई। हो सकता है गठबंधन करके लड़ने पर हम 2019 में कुछ सीटें जीत जाएं। पर, जनाधार का क्या होगा? इनका तर्क है कि हार के बावजूद बसपा का 20-22 फीसदी बेस वोट बना हुआ है।
गठबंधन होने पर यह बिखरेगा। कारण, तब यह भरोसा नहीं रहेगा कि सरकार बनने पर बसपा की नीतियों पर ही सरकार चलेगी। इनका यह भी कहना है कि काडर अपनी पार्टी को तो वोट दे देता है लेकिन किसी के कहने पर दूसरे दल को वोट ट्रांसफर करने को तैयार नहीं होता।
भावानात्मक रूप से जुड़ा है दलित मतदाता
डेमो
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विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन का ताजा प्रयोग सामने है। दोनों दलों के नेता साथ-साथ चुनावी अभियान चलाने के बावजूद अपने वोट एक दूसरे को ट्रांसफर नहीं करा पाए। बसपा के एक लोकसभा प्रभारी कहते हैं कि अगर गठबंधन होगा तो सीमित सीटें ही लड़ने के लिए हिस्से में आएंगी।
इससे जो लोग चुनाव लड़ने का मौका मिलने की उम्मीद में धन खर्च करते जा रहे हैं, उनका तो भविष्य ही चौपट हो जाएगा। गठबंधन से चुनाव पूर्व पार्टी में भगदड़ शुरू होने का खतरा भी हो सकता है।
राजनीतिशास्त्री प्रो. आरपी पाठक कहते हैं कि बसपा जिस तरह एक-एक चुनाव हारती जा रही है उससे उनके सामने अस्तित्व का संकट है। मायावती के नए स्टैंड से लगता है कि वह यह सोच रही हैं कि यदि एकला चलो की राह पर ही चलीं तो जो बेस वोट बचा है, वह भी नहीं बच पाएगा।
गठबंधन करके आगे बढ़ीं तो अल्पसंख्यक वोट नहीं बंटेगा। इससे स्थिति बेहतर हो सकती है। पर, मायावती को समझना चाहिए कि तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। दलित मतदाताओं का बड़ा तबका बसपा से सिर्फ भावनात्मक आधार पर जुड़ा है।
भाजपा ने सरकारी से लेकर संगठनात्मक कार्यक्रमों को बड़ी आक्रामकता के साथ अंबेडकर से जोड़ा है। भाजपा की कोशिश सफल रही तो ये दलित मतदाता जो धीरे-धीरे भाजपा की ओर शिफ्ट हो रहे हैं और तेजी से उधर चले जाएंगे।
‘सच्चाई न समझी तो मुश्किल बढ़ेगी’
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यह भी देखना होगा कि सहयोगी दल बसपा को कितना तवज्जो देते हैं? कितनी सीटें देते हैं? लोकसभा चुनाव में यदि गठबंधन होता है तो उसमें जो सीटें बसपा को मिलेंगी उन पर काडर के अलावा कितने वोट मिलेंगे यह तो भविष्य में सामने आएगा
लेकिन जहां बसपा का उम्मीदवार नहीं होगा वहां उसका बेस वोट निश्चित रूप से किसी और पार्टी के साथ चला जाएगा। यह ज्यादा नुकसानदेह हो सकता है। ध्यान देने की बात यह भी है कि पिछले दो चुनावों से बसपा से हटा दलित वोटर भाजपा की ओर ही गया है, किसी दूसरी ओर नहीं।
गोरखपुर विश्वविद्यालय में कांशीराम शोध पीठ के समन्वयक रहे प्रो. गोपाल प्रसाद कहते हैं कि डॉ. अंबेडकर और बसपा संस्थापक कांशीराम परिवारवाद के खिलाफ थे। मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर इस बुनियादी सिद्धांत को ही ठुकरा दिया है।
साथ ही दलित समाज के सामने कई सवाल भी खड़े किए हैं। कोई दूसरा व्यक्ति उन्हें योग्य नजर क्यों नहीं आया। उनके फैसले का संदेश साफ है कि सपा की तरह मायावती भी बसपा की आर्थिक व राजनीतिक पूंजी परिवार से बाहर नहीं जाने देना चाहतीं।
उनके भाई पर एक मामले में जिस तरह कानूनी शिकंजा कस रहा है, उससे बचाने के लिए उन्होंने भाई को उपाध्यक्ष बनाकर बसपा को एक टूल की तरह इस्तेमाल किया है। भाजपा और मोदी ने इतने आगे कदम बढ़ा दिए हैं कि गठबंधन से बसपा को कोई खास फायदा नहीं होने वाला।
बसपा को अपनी जमीन कमजोर होने की हकीकत स्वीकार कर लेनी चाहिए। व्यक्ति विशेष के हित में पार्टी के सिद्धांत ताक पर रखने के बजाय सर्वसमाज को साथ लेने की कोशिश करनी चाहिए। तभी वह बेहतर की उम्मीद कर सकती हैं।