यूपीए को बहुमत मिलने की संभावना नज़र नहीं आ रही, वहीं एनडीए के बारे में भी कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे में मायावती इस तरह खुद के लिए रास्ता तैयार कर रही हैं। ये तीन घटनाएं बताती हैं कि वह कैसे अपने मकसद को पूरा करने में लगी हुई हैं।
घटना एक : बाबा रामदेव ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लिए दलितों के घर हनीमून मनाने जैसे आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किया। इस हमले का जवाब देने के लिए न तो राहुल गांधी आगे आए और न सोनिया गांधी।
बाबा के खिलाफ मोर्चा खोला मायावती ने। उन्होंने ऐसे आपत्तिजनक बयान पर रक्षात्मक रुख अख्तियार करने के लिए सोनिया व राहुल पर निशाना साधा तो अपनी ओर से बाबा को रामदेव यादव कहते हुए उनके खिलाफ दलित उत्पीड़न का मामला दर्ज करने की मांग की।
बाद में रामदेव के खिलाफ देशभर में कई मामले दर्ज हुए।
मोदी को बनाया निशाना
घटना दो-प्रियंका वाड्रा ने नरेंद्र मोदी के अमेठी में दिए भाषण को ‘नीच राजनीति’ करार दिया तो मोदी के पलटवार पर कांग्रेसी दिग्गजों को सफाई देने में मुश्किलें नजर आईं।
पर, मोदी पर सबसे जोरदार हमला किया मायावती ने। उन्होंने यहां तक कह दिया कि जिस तरह से मोदी ने नीच राजनीति करने के आरोप पर घिनौनी राजनीति की है, उससे लगता है कि या तो इस व्यक्ति में कम बुद्धि है या फिर जान-बूझकर चुनावी लाभ के लिए शैतानी कर रहा है।
वरना थोड़ा लिखा-पढ़ा व्यक्ति भी नीच राजनीति करने के आरोप को एक जाति विशेष से जोड़ने की कतई नहीं सोचेगा।
कांग्रेस का किया बचाव
घटना तीन-मायावती ने 10 मई की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस के विकास व भ्रष्टाचार को लेकर भाजपा के हमले पर करारा पलटवार किया था।
उन्होंने नरेंद्र मोदी द्वारा केंद्र की यूपीए सरकार पर हमला बोलने को मोदी की चुनावी रणनीति का हिस्सा करार देते हुए आरोप के प्रभाव को कम करने कोशिश की तो भाजपा से 1998 से 2004 तक के छह साल तक के काम का हिसाब भी पूछती नजर आईं।
संसद पर हमला, करगिल युद्ध व विमान अपहरण जैसी घटनाओं का हवाला देकर उन्होंने मोदी के लिए ‘मौनी-व्यवहार’ का जुमला प्रयोग कर जवाब मांगा।
कई मकसद हैं माया के
मायावती चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा नेताओं के राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा पर किए गए सियासी हमलों का जवाब देने जिस तरह आगे आईं, उससे कांग्रेस व बसपा के सियासी रिश्तों की रणनीति का अंदाजा लगाया जाने लगा था।
पर, एनडीए और यूपीए में से किसी को भी स्पष्ट बहुमत न मिलने और यूपीए से पीएम पद का ऑफर मिलने पर स्वीकार करने से इन्कार न करके मायावती ने चुनावी नतीजे आने के पहले ही सत्ता के खेल में गर्माहट पैदा कर दी है।
विश्लेषक मानते हैं कि मायावती अपनी इस नई रणनीति से एक साथ कई निशाने साधती नजर आ रही हैं।
कांग्रेस के लिए विकल्प
दलित चिंतक और लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. कालीचरण सनेही कहते हैं, अब तक के चुनावी संकेतों से साफ लग रहा है कि यूपीए की सत्ता में वापसी नहीं हो रही है।
दूसरा, एनडीए के पक्ष में माहौल है लेकिन स्पष्ट बहुमत मिल पाएगा, इसमें संशय लग रहा है। यदि एनडीए को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो कांग्रेस एनडीए को सत्ता से बाहर रखने की कोशिश करेगी और कांग्रेस नेता इसके संकेत भी दे रहे हैं।
तब कांग्रेस की दीर्घकालिक रणनीति के लिहाज से बसपा से बेहतर कोई दल नहीं होगा। प्रो. सनेही कहते हैं कि मायावती ने दलितों के असंतोष को नजर अंदाज कर सवर्णों को काफी टिकट दिए हैं।
उनकी सभाओं में भीड़ भी आई है। शायद इसीलिए उन्हें लग रहा होगा कि वह पहले से बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगी और इसी आत्मविश्वास में उन्होंने बिना नतीजों का इंतजार किए अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं।
एनडीए को बहुमत न मिलने पर
प्रो. सनेही कहते हैं कि मायावती अपने पुराने अनुभवों से समझती होंगी कि भाजपा की बनिस्पत वाया कांग्रेस बैलेंस ऑफ पावर बनकर केंद्र की गद्दी तक पहुंचना बेहतर होगा।
कांग्रेस को भी सपा और बसपा में चयन करना होगा तो वह यूपी की मौजूदा कानून-व्यवस्था व सत्ता विरोधी रुझान के नाते बसपा को तवज्जो देना चाहेगी।
अब लगता है कि मायावती इन्हीं समीकरणों को ध्यान में रखकर कांग्रेस के पक्ष में कई मोर्चों पर आगे आईं।
एनडीए के बहुमत न मिलने पर सबसे पहले उन्होंने खुद को एक सशक्त दावेदार के तौर पर पेश तो कर ही दिया है।
माया की चुनावी रणनीति का हिस्सा
जाने-माने दलित चिंतक, राजनीतिक विश्लेषक व जीबी पंत सोशल साइंसेज इंस्टीट्यूट इलाहाबाद के प्रोफेसर डा. बद्रीनारायण कहते हैं कि लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण में यूपी की जिन 18 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उनमें अधिकतर सीटों पर भाजपा और बसपा के बीच लड़ाई है।
कुछ सीटों पर सपा भी सीधे लड़ रही है। ऐसे में मायावती खुद को बैलेंस ऑफ पावर के रूप में पेश कर मतदाताओं को यह संदेश देना चाह रही हैं कि वे अपना वोट बेकार नहीं कर रहे हैं।
दूसरा, मुस्लिमों का वोट उनके लिए बड़ा मायने रखता है। वह मुस्लिमों को यह बताना चाह रही हैं कि मोदी की विकल्प वे ही हैं।
एनडीए और यूपीए का विकल्प
बैलेंस ऑफ पावर बनकर खुद को पीएम के रूप में प्रमोट करना उनकी रणनीति का हिस्सा है।
वह कम से कम चुनाव के पहले बीजेपी से समर्थन लेने की बात कर नहीं सकतीं और खुद को पीएम की दावेदार के रूप में पेश करते समय यदि वह यूपीए का भी ऑफर ठुकराने की बात करें तो उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेगा।
वजह, पीएम पद के लिए मजबूत ताकत दिखानी है तो यूपीए या एनडीए में से किसी के नजदीक होने का संकेत करना जरूरी है। मायावती अपनी रणनीति के हिसाब से काम कर रही हैं।
इसके अलावा उन्होंने एनडीए व यूपीए से हटकर विकल्प बनने की दशा में खुद को आगे कर आगे की भी चाल चल दी है।