काशी में मतदाताओं के समर्थन को लेकर आकलन किये जा रहे हैं लेकिन शहर की नब्ज कुछ और कहती है। 'नई काशी' मोदी को लेकर कश्मकश में भी नहीं है।
मुस्लिम बहुल औरंगाबाद में रहने वाली शमां अंसारी का सवाल है, ये कौन सी बात है कि हम मुसलमान हैं तो मोदी को वोट नहीं दे सकते?
वोट देना हमारा हक है, इसे बताना जरूरी तो नहीं। बीएससी की पढ़ाई कर रहीं शमां का दर्द है कि वोट हमेशा हिंदू-मुसलमान की सोच से ऊपर उठकर क्यों नहीं पड़ता?
हमें कैंडिडेट में देखना चाहिए वह महिला शिक्षा और उनकी सुरक्षा के लिए क्या कर सकता है। कोई भी पार्टी इन मसलों पर ध्यान नहीं देती। शमां बनारस की वह बेटी हैं जो दकियानूसी सोच तोड़कर आगे बढ़ने को बेताब नौजवान पीढ़ी की नुमाइंदगी करती हैं।
गलत हो सकते हैं आकलन
कज्जाकपुरा की शाहीन भी सवाल करती हैं- आखिर कब लोग मुसलमानों को बैकवर्ड कहना बंद करेंगे? वे कहती हैं, मैं आईआईटी की तैयारी कर रही हूं। जींस, टॉप, स्कर्ट भी पहनती हूं। ...आखिर क्या बुराई है इसमें?
रहा सवाल भाजपा, कांग्रेस और आप में से किसी को वोट देने का, तो भाजपा को सिर्फ उसकी बनी हुई छवि के कारण वोट न करें, यह गलत होगा।
हां, आज भी अम्मी-दादी, पापा से पूछकर वोट डालेंगे, लेकिन मैं अपने फैसले खुद ले सकती हूं। शाहीन और शमां जैसी बेटियां असली काशी की प्रतीक हैं।
16वीं लोकसभा के चुनाव में जहां पूरे देश में ध्रुवीकरण की होड़ लगी है, काशी इससे कुछ हद तक अलग है। अपना रहनुमा चुनने के लिए उसका पैमाना वह नहीं है जो देश के दूसरे हिस्सों में नजर आता है, इसीलिए भीड़ से वोट और नतीजों का आकलन करने वाले यहां संभवत: धोखा खा सकते हैं।
नहीं किया निराश
काशी की जनता ने न नरेंद्र मोदी के इस्तकबाल में कमी छोड़ी, न अरविंद केजरीवाल को निराश किया और न ही राहुल गांधी और अखिलेश यादव को मायूस होने दिया।
कसौटी पर परखने के बाद ही अपनाती है काशी
सोमवार सुबह जब काशी वोट डाल रही होगी तो उसकी सोच और दायरे कुछ अलग ही होंगे। चुनाव में पूरे देश की तरह मुद्दा नरेंद्र मोदी हैं और जब वे वाराणसी से चुनाव लड़ रहे हों तो फलक व्यापक हो जाता है।
चर्चाओं और प्रचार में उनकी बढ़त साफ दिख रही है तो सिर्फ उनके नाम की खातिर नहीं। काशी ने अपनी रहनुमाई के लिए जो कसौटियां तय कर रखी हैं, उनमें वे काफी हद तक आगे भी हैं। बांसुरी बजाने वाले मुर्तजा भी इसीलिए कहते हैं- हमें सही मायनों में काशी की चिंता करने वाला नुमाइंदा चाहिए।
...धोखे तो 60 साल से खा ही रहे हैं। मजहबों की रहनुमाई करने वाले किसी भी पाले में खड़े दिखे हों, चिट्ठी और फतवे किसी के लिए भी जारी करते रहें, काशी के लोग अपनी कसौटी पर परखने के बाद ही किसी को अपनाते हैं।
केजरीवाल मुकाबले में नहीं
अरविंद केजरीवाल, मोदी के बाद बड़ा नाम हैं जो काशी का आशीर्वाद पाने वालों की कतार में हैं। उनको भी अपने नाम और पहचान का फायदा मिला है, लेकिन काशीवासियों से बात करें तो मोदी के मुकाबले वे भी खड़े नजर नहीं आते।
इस चुनाव से जीत-हार के अलावा वे जो चाहते हैं, मिल ही गया है। प्रचार का आखिरी दौर आते-आते अजय राय यदि उनके बराबर या आगे नजर आने लगे तो उसका कारण तलाशना बहुत मुश्किल नहीं है।
कई मजहबी रहनुमा केजरीवाल के साथ खड़े नजर आ रहे हैं लेकिन पीछे चलने वाले चुनावी महासमर में उनसे इत्तेफाक रखें, यह सौ फीसदी मुमकिन नहीं है।
बेनियाबाग में केजरीवाल के रोड शो के दौरान आप की टोपी लगाए मिले नौजवान मो. इरफान कहते हैं कि हमें भी मालूम है 16 मई के बाद उन्हें ढूंढना मुश्किल होगा।
दिल्ली का राज छोड़ने के बाद बनाई गई उनकी पलायनवादी छवि कहीं न कहीं उन पर चस्पा हो गई है।
अभी तो सबकी बम-बम
काशी के रण की मजेदार बात यह कि मोदी जैसे भारी-भरकम उम्मीदवार के सामने जितने भी प्रमुख प्रत्याशी हैं, सभी को अल्पसंख्यक वोटों का आसरा है।
सियासत और सिस्टम में बदलाव के झंडाबरदार केजरीवाल भी उनमें शामिल हैं तो कांग्रेस के स्थानीय उम्मीदवार अजय राय से लेकर सपा के कैलाश चौरसिया भी उसी कतार में खड़े हैं।
भले ही मोदी को बेनियाबाग में सभा करने की मंजूरी न मिली हो लेकिन बाकी तीनों प्रमुख उम्मीदवारों के रोड शो का एक अहम पड़ाव बेनियाबाग जरूर बना।
लेकिन, उस इलाके में जुटी भीड़ और बरसाए, फिकवाए गए फूलों के गणित से तीनों बम-बम हैं। हालांकि उनकी जमीन का खुलासा 16 मई को ही हो पाएगा।
दिखावे के लिए विरोध
पूरे चुनाव प्रचार में मोदी के विरोध में जुटे राजनीतिक दलों और नेताओं की गंभीरता का अंदाज महज इससे लगाया जा सकता है कि वे साझा उम्मीदवार तक नहीं ला पाए। विरोध का खोखलापन और विशुद्ध सियासत के निहितार्थ इससे जाहिर होते हैं।
कौमी एकता दल के बाहुबली मुख्तार अंसारी यदि कांग्रेस के पाले में नजर आए तो इसका कारण सिद्धांत नहीं अपनी सियासत ही ज्यादा है। मुख्तार को 2009 के चुनाव में 1.86 लाख वोट मिले थे तो उसमें बहुजन समाज पार्टी का वो बेस वोट भी था जिसके वे पिछली बार उम्मीदवार थे।
हालांकि इस चुनाव में न बसपा उम्मीदवार खास नजर आया और न ही उसका हो-हल्ला है। कांग्रेस से ताल ठोक रहे अजय राय का अपना वोट आधार है। वर्ष 2009 के चुनाव में 1.24 लाख वोट लेकर वह तीसरे स्थान पर रहे थे तो उसमें सपा के वोट भी थे, जिससे उन्होंने चुनाव लड़ा था।
अब सपा के पाले से कैलाश चौरसिया की उम्मीदवारी है। ये काशीवासियों का ही कमाल है कि कांग्रेस के जिन डॉ. राजेश मिश्रा को उन्होंने 2004 में 2.07 लाख वोटों से जिताया था, उन्हें ही 2009 में 66 हजार वोटों पर सीमित कर दिया।
मन की आंखों से समझें काशी को
काशी में जातियां हैं, उनकी ताकत भी नजर आती है। सियासत का जो दौर चल रहा है, उसमें इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है कि काशीवासी जाति के पैमाने और दायरे में वोट करें।
लेकिन, वोटिंग का सिर्फ यही आधार बनता रहा है, ये कयास उतना ही अनिश्चित और उलझनों से भरा हो सकता है, जैसा कि रोड शो देखकर न्यूज चैनल सभी की हवा चलाने लगे हैं।
काशी को समझने के लिए कई पैमाने हो सकते हैं, कई नजरिये हो सकते हैं, कई आंखें हो सकती हैं, लेकिन इस सांस्कृतिक नगरी के लिए मन की आंखें भी होनी चाहिए तभी हकीकत का अंदाज संभव है। कण-कण में जिसके पारस है, वो बनारस है।