लखनऊ। उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार के 77वें स्थापना दिवस पर बुधवार को भारतीय ज्ञान परंपरा में पांडुलिपियों का महत्व एवं भावी पीढ़ी के लिए उपयोगिता विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं अभिलेख प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने पांडुलिपियों के संरक्षण व उनके ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती विवि के कुलपति प्रो. अजय तनेजा ने कहा कि पांडुलिपियां हमारी वह अमूल्य धरोहर हैं, इन्हें सुरक्षित रखना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।
प्रथम सत्र में प्रो. सुमन मिश्रा ने अभिलेखागारों को राष्ट्र की स्मृति संस्थाएं बताते हुए युवाओं से इनके संरक्षण के लिए आगे आने का आह्वान किया। बीएचयू के प्रो. अरुण कुमार यादव ने बताया कि बौद्ध ग्रंथ ललित विस्तर में 64 लिपियों का उल्लेख है। उन्होंने श्रीलंका में सिंहली लिपि में लिखे गए प्रथम बौद्ध ग्रंथ त्रिपिटक का उदाहरण देते हुए कहा कि आज भी इन पर शोध की अपार संभावनाएं हैं।
द्वितीय सत्र में लविवि के डाॅ. सत्यकेतु और डाॅ. दीप्ती जायसवाल ने पांडुलिपियों को ज्ञान का दस्तावेज बताया। प्रो. अनिल कुमार और डाॅ. सौरभ मिश्रा ने भारत सरकार के ज्ञान भारतम् मिशन की सराहना करते हुए कहा कि पोर्टल के माध्यम से पांडुलिपियों को जन-सामान्य के लिए उपलब्ध कराना बड़ा कदम है।
संगोष्ठी के अंत में विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से आए 150 छात्र-छात्राओं को प्रमाणपत्र वितरित किए गए। निदेशक अमित कुमार अग्निहोत्री एवं सहायक निदेशक (संरक्षण) विजय कुमार श्रीवास्तव ने अतिथियों का आभार व्यक्त किया।