नगर निगम अधिनियम के तहत हर दो साल में गृहकर की दरों में बदलाव कर उसको बढ़ाया जा सकता है। ऐसे में यदि निगम प्रशासन अधिनियम पर अमल करता तो सात बार टैक्स की दरें बढ़तीं। वहीं, चार साल में पूरे शहर का सर्वे कर नए सिरे से गृहकर निर्धारण करना होता है, ताकि जो छूटे हैं, वे भी टैक्स के दायरे में आ जाएं। लेकिन यह काम भी 14 साल से नहीं हुआ।
पिछले दिनों हुए जीआईएस सर्वे में कुछ छूटे मकान सामने आए हैं, लेकिन सर्वे सही नहीं होने से समस्या आ रही है। सर्वे में कई जगह झुग्गियों को भी मकान बता दिया गया। यह सच तब सामने आया जब कर्मचारियों ने मौके पर जाकर जीआईएस सर्वे की रिपोर्ट का सत्यापन किया।
करीब आठ साल पहले गृहकर (आवासीय व गैर आवासीय) की दरों में 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी करने का प्रस्ताव तैयार हुआ था। यह प्रस्ताव पास होकर लागू हो जाता, तो गृहकर के साथ ही जलकर का भी भार शहरवासियों पर बढ़ जाता।