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लखनऊ डायरी: अरे भाई! आचार संहिता कब लगेगी

Mon, 25 Oct 2021 11:01 AM IST
अनुराग सक्सेना अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

चुनावी बयार के बीच नई योजनाएं ठंडे बस्ते में चली गई हैं। कई ऐसी हैं जिन्हें अधिकारी शुरू भी नहीं करना चाहते हैं। कुछ ऐसा ही छात्रों को तकनीकी शिक्षा देने वाले विभाग में चल रहा है।
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव व बसपा सुप्रीमो मायावती। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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चुनावी बयार के बीच नई योजनाएं ठंडे बस्ते में चली गई हैं। कई ऐसी हैं जिन्हें अधिकारी शुरू भी नहीं करना चाहते हैं। कुछ ऐसा ही छात्रों को तकनीकी शिक्षा देने वाले विभाग में चल रहा है। युवाओं को दक्ष बनाने और उन्हें रोजगार देने के लिए योजनाएं बनाई गईं लेकिन उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी कोई लेने को तैयार नहीं है। निदेशालय व शासन के बीच योजनाओं का आदेश झूल रहा है। अधिकारी इंतजार कर रहे हैं कि जल्द समय कटे और चुनाव की घोषणा हो। अब कयासबाजी हो रही है कि आचार संहिता कब लगेगी।

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मुखिया को पुरानी टीम पर भरोसा नहीं
प्रदेश के एक चिकित्सा संस्थान के मुखिया को पुरानी टीम पर भरोसा नहीं है। वह संस्थान की हर गतिविधियों के लिए अपनी अलग टीम बना रहे हैं। टीम में संस्थान के लोगों की कमी हो जाती है तो आउटसोर्स का सहारा लेते हैं। इस हथकंडे ये अपने मूल विभाग के कई सेवानिवृत्त होने वालों को दोबारा मौका दे चुके हैं। एक के बाद एक नए सिपहसालार के आने से पुरानी टीम में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। अब यह कहा जाने लगा है कि शासन को मुखिया के बजाय पूरी टीम नियुक्त करनी चाहिए। ताकि काम भी बेहतर हो और पैसों की बर्बादी न हो।

समझ लो मंशा हुकूमत की
हुकूमत ने दो साहबों को मुलाजिमों से जुड़ी मांगों पर चर्चा करने के लिए अधिकृत किया है। इनमें से एक वे हैं जिन्होंने मुलाजिमों का कद, पद व बटुए में कटौती से जुड़ा कोई मौका नहीं छोड़ा। हुकूमत की पैरवी में हर वक्त गला फाड़ने वाले एक कर्मचारी नेता परेशान हैं कि न जाने हुकूमत की मति को क्या हो गया है? ये कर्मचारियों को मनाने चले हैं या फिर धमकाने?

राजनीतिक फकीर नहीं है अपुन
वर्षों से राजनीति में सक्रिय पिता ने अपनी विरासत पुत्री को सौंप दी है। पिता-पुत्री एक विवाद में फंसे तो पार्टी वाले भी समर्थन आ गए। बड़ी नेताइन ने भी कई बार बात की कि कुछ ट्वीट वगैरह करना है तो बताओ? पिता-पुत्री नेता हाथ जोड़कर खड़े हो गए। जब जरूरत होगी तो बता देंगे। कुछ लोग इसका कारण ढूंढ़ने में लग गए। पता चला कि पिता-पुत्री के नजदीकियों के कई संस्थान हैं। खजाने से मदद भी मिलती है। जांच हो गई तो बना बनाया खेल बिगड़ जाएगा। इसलिए मामला रफा-दफा करने में ही भलाई। राजन जैक फकीर हो तो कैसे भी और कितना भी लड़ लो।
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मिशन डिकोड
तीन माननीय सुबह-सुबह एक वजीर के घर पहुंच गए। तीनों के मुताबिक ओबीसी वर्ग के ये वजीर पिछले विधानसभा चुनाव से पहले दूसरे दल से सत्ताधारी दल में आए थे। वहां पहुंचने पर दिखा कि बिना झंडे व एक ही नंबर वाली अलग-अलग सीरीज की तीन गाड़ियां खड़ी हैं। दरबारियों ने पूछा कि समय लेकर आए हैं। बताया नहीं। दरवानों ने बताया कि फरमान है कि बिना समय लिए नहीं मिल पाएंगे। किसी के साथ मीटिंग है। आखिरकार माननीयों की बिना मिले ही लौटना पड़ा और से वहां खड़ी तीनों गाड़ियों को डिकोड करने में लग गए। अब इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि बजौर से मिलने कोई और नहीं, अपने ठेकेदार गुर्गों की गाड़ियों से पहुंचे विरोधी दल के एक रुस्तम थे जो आजकल दूसरे दलों के लोगों को अपनी पार्टी में शामिल कराने का मिशन सभाले हुए हैं।

फिक्स मैच का परिणाम
दिल्ली वाली मोहतरमा इन दिनों लखनऊ में डेरा जमाए हुए हैं। पार्टी राष्ट्रीय है, सो सुर्खियां भी खूब बटोरती हैं। हाल ही में उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस की। मानो मैच पहले से ही फिक्स था। पहले से ही संवाददाताओं को सवाल बता दिए गए थे कि किसे क्या पूछना है? उनके अलावा किसी और ने पूछना चाहा तो दिल्ली से साथ आईं दूसरी मोहतरमा ने मौका ही नहीं दिया। अगले दिन मोहतरमा ने रोड पर प्रदर्शन किया। पर, मीडिया में खबरें उतनी जगह नहीं पा सकीं, जितने कि उन्हें अपेक्षा थी। मीडिया के एक जिम्मेदार व्यक्ति से पूछा गया तो उन्होंने भी बड़ी साफगोई से पार्टी के अंदर जवाब दे दिया- जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे। जब लखनऊ वालों को बात करने का मौका ही नहीं दोगे तो फिक्स मैच का परिणाम ऐसा ही होगा।
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