इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने नाबालिग से दुष्कर्म व हत्या करने के मामले में सजायाफ्ता की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। कोर्ट ने कई नजीरों का जिक्र करते हुए कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है, जहां यह कहा जा सकता है कि अपीलकर्ता को मौत की सजा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। उसके शेष जीवन काल के लिए उसकी मृत्यु तक बिना किसी समयपूर्व रिहाई या छूट के कारावास एक उपयुक्त सजा होगी।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति सरोज यादव की खंडपीठ ने यह फैसला सजायाफ्ता गुड्डू उर्फ गुब्बू की जेल से भेजी गई अपील को आंशिक रूप से मंजूर कर सुनाया। इसमें उसे हरदोई की एक सत्र अदालत से सुनाई गई फांसी की सजा को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने उसे निचली अदालत से सुनाई गई अन्य सजाओं को यथावत बहाल रखा है।
सजायाफ्ता पर वर्ष 2014 में नाबालिग बच्ची का अपहरण उसके साथ दुष्कर्म व हत्या करने का आरोप था। इस केस में पिछले साल सत्र अदालत ने उसे विभिन्न आरोपों में अन्य सजाओं के साथ फांसी की सजा सुनाई थी। उधर सरकारी वकील ने अपील का विरोध किया।
कोर्ट ने अपीलकर्ता की ओर से पेश हुए न्यायमित्र अधिवक्ता राजेश कुमार द्विवेदी की सहायता की सराहना की है। साथ ही उन्हें इसके लिए हाईकोर्ट से 25 हजार रुपये फीस प्राप्त करने का हकदार कहा है।