श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के चलते प्रदेश की राजनीति की दिशा व दशा में आए बदलाव के बाद हुए लोकसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो 2004 व 2009 को छोड़कर शेष सभी चुनावों में इन सुरक्षित सीटों पर भाजपा ही आगे रही।
इस आंदोलन का जिक्र इसलिए क्योंकि इसी कालखंड में बामसेफ और दलित शोषित समाज संघर्ष समिति डीएस-4 के नाम से अनुसूचित जातियों के बीच सामाजिक चेतना पर काम करने वालों में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी का गठन कर इन जातियों की सियासी चेतना को एक दिशा देने की तरफ कदम बढ़ाया।
वहीं, पिछड़ों की सियासी चेतना को एकजुट करने के लिए मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का गठन किया। फिर भी सिर्फ दो चुनाव छोड़कर शेष पांच में इन सीटों पर भाजपा का ही परचम फहरा।
समीकरणों का संयोग
उत्तर प्रदेश में इन 17 सुरक्षित सीटों पर पिछले सात चुनावों में भाजपा जब पांच बार आगे रही तो उसने केंद्र में चार बार सरकार बनाई और पिछड़ी तो केंद्र की सत्ता भी उसके हाथ से फिसल गई। शायद यही वजह थी कि भाजपा ने 2014 के चुनाव में इन सीटों को लेकर विशेष रणनीति बनाई। पुराने नतीजों का विश्लेषण कर हिंदुत्व का रंग गाढ़ा किया और अगड़ों, पिछड़ों और अनुसूचित जाति की गोलबंदी से इन सभी सीटों पर जीत का झंडा फहरा दिया।
अविभाजित उत्तर प्रदेश में लोकसभा की सुरक्षित 18 सीटें थीं, जिनमें भाजपा के पास 14 सीटें तक रह चुकी हैं। वर्ष 2004 व 2009 में सपा और बसपा को भाजपा से ज्यादा सीटें मिलीं तो भाजपा के हाथों से केंद्र की सत्ता दूर हो गई। वहीं, 2014 में इन सभी 17 सीटों पर भाजपा की जीत हुई तो उसने केंद्र की सत्ता पर कब्जा जमा लिया।
हर दल का प्रयास, अनुसूचित जातियां आएं साथ
सपा और बसपा ने गठबंधन कर अनुसूचित जाति और पिछड़ों के वोट गोलबंद करने की कोशिश की है। इनका शायद आकलन है कि अगर इस गोलबंदी से इन सुरक्षित 17 सीटों और कुछ अन्य सीटों पर मुस्लिम वोट जोड़कर भाजपा का विजय रथ रोक दिया जाए तो केंद्र की सत्ता पर इस बार कमल खिलना मुश्किल हो जाएगा।
वहीं, भाजपा के रणनीतिकारों ने भी इन सीटों का गणित समझते हुए अनुसूचित जाति के वोट को लामबंद करने की लगातार कोशिश की है। इसके लिए डॉ. आंबेडकर से जुड़े पांच स्थानों को पंचतीर्थ का दर्जा देने से लेकर अन्य कई काम किए हैं।
राजनीति शास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी का कहना है कि यह धारणा ही गलत है कि अनुसूचित जाति का मतदाता बहुजन समाज पार्टी का ही है। पहले भी अलग-अलग नेताओं ने अनुसूचित जाति के नाम पर अपने राजनीतिक मंचों को मजबूत करने की कोशिश की है लेकिन कहीं कोई बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं बन पाया। सामाजिक चेतना अलग बात है लेकिन सवाल जब राजनीतिक नेतृत्व चुनने का होता है तो दूसरों की तरह यह वर्ग भी लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय समीकरणों को ध्यान में रखकर और विधानसभा चुनाव में स्थानीय समीकरणों के मद्देनजर वोट करता है। इसीलिए विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा सुरक्षित सीटों पर बड़ी कामयाबी हासिल कर लेती है, पर लोकसभा चुनाव में ज्यादातर भाजपा आगे दिखती है। हालांकि इस बार सपा-बसपा गठबंधन के कारण इन सीटों का गणित बदल सकता है।
वर्ष--भाजपा--बसपा--कांग्रेस--सपा --अन्य
1991--09--00 --01--00--08
1996--14--02--00--02--00
1998--11--02--00--05--00
1999--07--05 --00--05--01
उत्तराखंड बनने के बाद बची 17 सीटें एक नजर में
2004--03--05 --01--07--01
2009--02--02 --02--10--01
2014--17--00 --00--00--00
विधानसभा चुनाव 2017 में 86 सुरक्षित सीटें एक नजर में
भाजपा--75
सपा--07
बसपा--03
अन्य--01