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निकाय चुनाव परिणाम दे गए बीजेपी को बड़ा सबक, 2019 में मिल सकती है चुनौती

Sun, 03 Dec 2017 10:44 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, सीएम योगी व पीएम मोदी - फोटो : डेमो
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निकायों के चुनाव भले ही लोकसभा और विधानसभा चुनाव की तुलना में छोटे माने जा रहे हों, लेकिन इनके नतीजे बड़ा संदेश देने वाले हैं। इन नतीजों में लोकसभा चुनाव 2019 की नींव छिपी हुई है। भाजपा और कांग्रेस तो पहले भी निकाय चुनाव अपने निशान पर ही लड़ा करती थीं, पर इस बार चुनाव चिह्न के साथ मैदान में उतरी बसपा ने महानगरों में जैसा प्रदर्शन किया, उससे उसका उत्साह बढ़ेगा।
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उसकी कोशिश होगी कि वह इस समर्थन को संभालकर रखे और उसे आधार बनाकर लोकसभा चुनाव की तैयारी करे। इसे भाजपा को भी समझना होगा। नतीजे जनता में भाजपा की साख बरकरार होने का संदेश देने वाले हैं। यह भी बता रहे हैं कि विपक्ष के तमाम दावों तथा आरोपों के बावजूद लोगों का मोदी और योगी सरकार के निर्णयों पर भरोसा कायम है।

उन्हें विश्वास है कि भाजपा ही उनके नगर को सुंदर, स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखकर स्मार्ट बना सकती है। बावजूद इसके नतीजों में भाजपा के लिए कुछ नसीहतें भी छिपी हैं। वहीं इन नतीजों में सपा और कांग्रेस के लिए आत्ममंथन की सलाह है। यह जीत एक तरह से भाजपा की विजय की हैट्रिक है।
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लोकसभा चुनाव 2014 से शुरू हुई जीत का सिलसिला विधानसभा चुनाव होते हुए निकाय चुनाव तक पहुंचा है, पर बसपा ने दो नगर निगमों में महापौर की सीट जीतकर और तीन जगह भाजपा से सीधे मुकाबले में रहकर साफ कर दिया है कि उसे कमतर नहीं आंकना चाहिए। कुछ न कुछ ऐसा जरूर हो रहा है जो महानगरों में बसपा का समर्थन बढ़ा रहा है।

... गुजरात चुनाव के लिए भी बढ़त

बसपा का अलीगढ़ और मेरठ जैसी सीटें भाजपा से छीन लेना यह संदेश दे रहा है कि जीत से उत्साहित भाजपा को अति उत्साह से बचना होगा। जिला मुख्यालयों और शहरों में भाजपा का आंकड़ा बढ़ा जरूर है लेकिन कस्बों या छोटे शहरों के आंकड़े यह साफ करते हैं कि भाजपा की आगे की राह मजबूत जरूर हुई है लेकिन अभी पूरी तरह निरापद नहीं है।पार्टी के रणनीतिकार इन चुनाव नतीजों को आधार बनाकर आगे की रणनीति बना सकते हैं।

पर, इनकी अनदेखी लोकसभा चुनाव की चुनौतियों को बढ़ाएगी।भाजपा के प्रदेश महामंत्री विजय बहादुर पाठक दावा करते हैं कि विपक्ष ने जीएसटी को लेकर भाजपा पर बड़े आरोप लगाए थे। अब उसे स्वीकार कर लेना चाहिए कि जनता ने जीएसटी के फैसले को स्वीकार कर लिया है। व्यापारियों में कोई नाराजगी नहीं है।

पाठक की बात सही हो सकती है लेकिन इस जीत में भाजपा के सामाजिक समीकरणों के गणित का भी योगदान है। भाजपा ने महापौर के 16 उम्मीदवारों में सात उम्मीदवार सिर्फ वैश्य बिरादरी और दो उम्मीदवार पंजाबी बिरादरी से उतारकर जहां व्यापारियों को साधने की कोशिश की थी तो दो पर अनुसूचित जाति और चार पर ब्राह्मण तथा एक पर पिछड़े  वर्ग के उम्मीदवार को लाकर इस गणित को दुरुस्त बनाने का प्रयास किया था।

नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों मेें भी इन समीकरणों का विशेष ख्याल रखा गया था। निकाय चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन अगर ठीक नहीं रहता तो विपक्ष उसे गुजरात से भी जोड़ता। खासतौर से कांग्रेस इसका खूब प्रचार करती। सपा और बसपा भी इसे योगी सरकार के खिलाफ जनमत बताती।

जाहिर है कि भाजपा भी अब इन नतीजों को अपने पक्ष में माहौल बनाने के  लिए इस्तेमाल करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इन नतीजों के सहारे गुजरात में पार्टी के पक्ष में माहौल को और मजबूत बनाएंगे। वहीं ये नतीजे भाजपा को लोकसभा चुनाव की तैयारियों में भी मदद पहुंचाएंगे।

सपा व कांग्रेस को बड़ी हिदायत

सपा मुखिया अखिलेश यादव को इन नतीजों से काफी कुछ सीखने की जरूरत है। भले ही सिम्बल पर नहीं, लेकिन बरेली में पार्टी का समर्थित मेयर ही लंबे अरसे से चला आ रहा था। पर, इस बार सपा का एक भी महापौर नहीं जीता। फिरोजाबाद जो सपा का गढ़ माना जाता था।

लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में भी भाजपा जहां परचम नहीं फहरा पाई थी, वहां भाजपा ने न सिर्फ जीत दर्ज की बल्कि सपा के शक्तिशाली नेताओं में शुमार और अखिलेश के चाणक्य कहे जाने वाले उनके चाचा प्रो. रामगोपाल यादव को भी तगड़ा झटका दिया है। जसवंत नगर सीट पर भी सपा की हार और अखिलेश के दूसरे चाचा शिवपाल सिंह यादव का यह बयान कि जो टिकट बेचने से बचे होंगे,

उन पर शायद सपा जीत जाए, अखिलेश को बताने के लिए पर्याप्त है कि परिवार की फूट अगर खत्म नहीं हुई तो अखिलेश की आगे की राह आसान नहीं रहने वाली। उन्हें विश्लेषण करना होगा कि 2012 के विधानसभा चुनाव में बड़े महानगरों में धमाकेदार जीत दर्ज करने वाली सपा का यह हाल क्यों हुआ। पार्टी नेतृत्व को अपने वोट बैंक को दुरुस्त रखना होगा।

निकाय चुनाव में करारी कांग्रेस की करारी शिकस्त संदेश दे रही है कि उसके नेता अगर अब भी न चेते तो 2019 में भी पुनरुद्धार मुश्किल है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को उत्तर प्रदेश में संगठन की बागडोर संभालने वालों से चुनाव नतीजों पर पूछताछ के साथ ही ईमानदारी से विश्लेषण करना चाहिए कि किन कारणों से उनका कोई फॉर्मूला यूपी में कामयाब नहीं हो पा रहा है। राहुल और सोनिया गांधी को इस सच को समझना होगा कि यूपी में मजबूत हुए बिना देश में कांग्रेस को मजबूती नहीं मिलने वाली।
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भाजपा को बचना होगा अति उत्साह से

भाजपा नेता अमित पुरी दावा करते हैं कि दो सीटों पर बसपा की जीत का मतलब बसपा का ग्राफ बढ़ना या उनके पक्ष में जनसमर्थन जुटना नहीं है। अगर बसपा के पक्ष में माहौल होता तो छोटे शहरों में वह सबसे आगे रहती। पुरी की बात के विपरीत भाजपा के लिए इन नतीजों में अति उत्साह बचने की सलाह अकारण नहीं है। अतीत पर नजर डालने से पता चलता है कि महानगरों में भाजपा का दबदबा पहले भी रहा है।

पिछले चुनाव में ही भाजपा को 12 नगर निगमों में 10 में जीत मिली थी। वर्ष 1995 में जब सीधे जनता से महापौर का चुनाव शुरू हुआ था, तब भी भाजपा महानगरों में सबसे बड़ा दल बनकर सामने आई थी। जब भाजपा प्रदेश विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी बन गई थी, तब भी महानगरों में वह अव्वल रहती थी। यह बात सही है कि इस बार भाजपा का छोटे निकायों में आंकड़ा बढ़ा है।

नगर पालिका परिषद के अध्यक्षों में भाजपा पिछली बार 42 स्थानों पर जीती थी। इस बार यह आंकड़ा 67 पर पहुंच गया। इसी तरह नगर पंचायतों में भाजपा 36 से 100 पर पहुंच गई है। पर, पार्टी के रणनीतिकारों को ध्यान रखना होगा कि नगर पंचायतों में निर्दलीयों का दबदबा अब भी बरकरार है। 

चुनाव नतीजों से यह संकेत भी निकले हैं कि बसपा भले ही लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बहुत कुछ न कर पाई हो, लेकिन उसकी स्थिति राख के नीचे आग जैसी है, जिसकी चिनगारी इस चुनाव  में दिखने लगी है। बसपा ने महानगरों में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।

अति उत्साह से भाजपा को इसलिए भी बचना होगा कि अगर बसपा ने फिर 2007 की तरह ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम के समीकरण पर काम शुरू कर दिया तो भाजपा की मुश्किलें बढ़ेंगी। बसपा के लिए यही संदेश है कि वह इन नतीजों को आधार बनाकर इस फॉर्मूले पर आगे बढ़े तो उसकी वापसी हो सकती है।
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