उत्तर प्रदेश में 14 वर्ष से कम उम्र के 7.13 करोड़ बच्चों में 3.45 करोड़ यानी करीब आधे बच्चे स्कूल नहीं जा रहे। यह खुलासा हुआ है हाल ही में गृह मंत्रालय के जनगणना निदेशालय की ओर से जारी जनगणना 2011 के शिक्षा संबंधी आंकड़ों के विश्लेषण में।
इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का स्कूल न पहुंचना प्रदेश में साक्षरता के हालात को खुद-ब-खुद बयां कर देता है। मंगलवार को विश्व साक्षरता दिवस है। सूबे में क्या हालता हैं, पेश है रिपोर्ट...
स्कूल नहीं जा रहे बच्चों का आंकड़ा इतना बड़ा है कि यह पूरे देश के न केवल साक्षरता के आंकड़ों पर असर डाल सकता है, बल्कि वर्कफोर्स में सकारात्मक इजाफा करने के बजाय बोझ बन जाएगा। जानकारों का मानना है कि स्कूली शिक्षा से महरूम रह जाने वाले इन बच्चों का भविष्य तो बिगड़ ही रहा है, प्रदेश और देश के लिए भी यह बेहद नुकसानदेह साबित होगा।
बाल अधिकारों पर काम कर रही एक्टिविस्ट वनिता करोली बताती हैं कि एक ओर बच्चों को स्कूल से जोड़ने की बात की जा रही तो दूसरी ओर शहरों में ही रह रहे बेहद गरीब परिवारों के बच्चों का स्कूल पहुंचना मुश्किल होता जा रहा है। वजह है उनके अभिभावकों का प्रवासी मजदूर होना।
यह है प्रमुख कारण
कुछ-कुछ महीनों में एक स्थान से दूसरे स्थान जाने को मजबूर ये परिवार अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष में उलझे रहते हैं और अपने बच्चों को स्कूल भेजना सोच भी नहीं पा रहे।
लखनऊ जैसे शहर में ही जहां बड़े स्तर पर आधारभूत संरचनाओं का विकास व निर्माण हो रहा है, उनमें काम करने वाले नागरिकों के बच्चे स्कूल नहीं जा रहे। ग्रामीण इलाकों में भी लगभग यही स्थिति है जहां कृषि मजदूर भी प्रवासी हो गए हैं।
बहुत नहीं बदले हालात
यूपी की करीब 20 करोड़ की कुल आबादी में से केवल 9.43 करोड़ नागरिक ऐसे हैं जो स्कूल गए हैं, या जा रहे हैं। वहीं 10.54 करोड़ स्कूल नहीं जा सके। इस वर्ग में सभी उम्र के नागरिक शामिल हैं। यह आंकड़ा करीब 52.77 प्रतिशत है, वहीं 14 वर्ष से कम उम्र में स्कूल नहीं जा रहे बच्चों का प्रतिशत 48.40 है। इससे समझा जा सकता है कि बीते दो दशकों में बच्चों को स्कूल भेजने को लेकर हालात में बहुत बदलाव नहीं आया है।
बेटियों का प्रतिशत और भी कम
स्कूल जा रहे बच्चों में लड़कों का प्रतिशत 52.39 है। यह बहुत अच्छा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन लड़कियों में यह प्रतिशत और भी घट कर 49.51 रह जाता है। यह अंतर बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन लड़कियों की शिक्षा के लिए किए जा रहे प्रयासों को ज्यादा प्रभावी ढंग से लागू करने की जरूरत बताता है।
यूपी में कुछ ऐसे हैं हालात
उम्र : कुल / पुरुष / महिला - स्कूल गए / पुरुष / महिला
6 वर्ष तक : 30791331 / 16185581 / 14605750 - 3807546 / 2044860 / 1762686
9 वर्ष तक : 45438385 / 23910805 / 22327580 - 15443317 / 8247346 / 7195971
12 वर्ष तक : 61904950 / 32694896 / 30010054 - 29273112 - 15705788 / 13567324
14 वर्ष उम्र तक : 71308266 / 37589959 / 34518307 - 36788243 / 19695122 / 17093121
कुल आबादी - 199812341 / 104480510 / 95331831 - 50401095 / 27257101 / 23143994
यूपी में साक्षरता : फैक्ट फाइल
- 69.72 प्रतिशत साक्षरता 2011 की जनगणना अनुसार
- पुरुषों में साक्षरता दर 77.28 तो महिलाओं में 57.18 प्रतिशत
- 29वां स्थान देश में
- 56.27 प्रतिशत साक्षरता थी 2001 की जनगणना के अनुसार
- तब पुरुषों में साक्षरता दर 68.82 तो महिलाओं में 42.22 प्रतिशत थी
- 13.45 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की यूपी ने तबसे
- छठवें स्थान पर रहा यूपी साक्षरता दर वृद्धि के लिहाज से
नामांकन के बाद एक तिहाई ड्रॉपआउट भी हैं
उत्तर प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग से जुड़ी जूही सिंह का कहना है कि प्रदेश के आधे बच्चों का स्कूल नहीं पहुंच पाना बेहद चिंता में डालने वाला आंकड़ा है। इसमें मैं यह भी बताना चाहूंगी कि जो बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं, उनमें भी करीब 35 प्रतिशत ड्रॉपआउट कर जाते हैं। ये बेहद गंभीर है। बाल आयोग ने प्रदेश सभी जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों से बारी बारी उनके जिलों में बच्चों के नामांकन की रिपोर्ट मंगवानी शुरू कर दी है। इस दौरान उनसे नामांकन अभियान के दौरान स्कूल से जोड़े गए बच्चों की फॉलो-अप रिपोर्ट भी ली जाएगी।
गरीबों के बच्चों को सरकारी के साथ-साथ प्राइवेट स्कूलों में आरटीई प्रदत्त अधिकारों के तहत 25 प्रतिशत सीटों पर प्रवेश दिलाना आयोग का साक्षरता की दिशा में दूसरा बड़ा अभियान है, जिसे तेजी दी जा रही है। उम्मीद है निकट भविष्य में बच्चों को अधिक संख्या में स्कूलों से जोड़ा जा सकेगा।