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बिहार के नतीजों ने मिशन यूपी के लिए दिए छह सियासी सबक

Mon, 09 Nov 2015 12:59 AM IST
राजेन्द्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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(राजेन्द्र सिंह)बिहार विधानसभा चुनाव के आए एकदम अप्रत्याशित नतीजों ने यूपी में सभी दलों को सियासी सबक दे दिए हैं। सत्तारूढ़ सपा सरकार दोबारा सत्ता चाहती है तो उसे मोदी व भाजपा से नजदीकी का संदेश देने से बचना होगा।
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वहीं, 2017 विस चुनाव में सत्ता का खवाब पाले बैठी भाजपा को ध्रुवीकरण से किनारा करना होगा। दूसरी ओर बसपा की सबसे बड़ी चुनौती अपने वोटों के भाजपा के पक्ष में जाने से रोकने की होगी। वहीं, यूपी में हाशिए पर चली गई कांग्रेस को सिर उठाने के लिए किसी न किसी मददगार की जरूरत पड़ेगी। एक रिपोर्ट-

यूपी में दोबारा सत्ता का सपना देख रही सपा को बिहार के नतीजों ने संदेश दिया है कि मोदी और भाजपा से किसी भी प्रकार की नजदीकी या नरमी उनकी पार्टी के लिए घातक है। संदेश यह भी है कि सपा को लालू और नीतीश की तरह न सिर्फ मोदी और भाजपा से लड़ते हुए दिखना होगा, बल्कि मुस्लिम मतदाताओं के मन के असमंजस को भी दूर करना होगा। वह भी ध्रुवीकरण वाली भाषा के इस्तेमाल से परहेज रखकर।
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बिहार में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने ऐन चुनाव से पहले जिस तरह नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव का साथ छोड़ दिया और 146 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए, उससे यही संदेश गया कि किसी कारण से मुलायम सपा उम्मीदवारों के जरिये महागठबंधन का समीकरण बिगाड़ना चाहते हैं। मुलायम के इस कदम का पिछड़ी जातियों पर प्रतिकूल प्रभाव हुआ।

उन्हें लगा कि सपा लालू और नीतीश जैसे पिछड़ी जातियों के नेताओं को सत्ता तक नहीं पहुंचने देना चाहते हैं। वहीं, मुस्लिमों को लगा कि लालू-नीतीश को कमजोर करने की कोशिश से भाजपा बिहार में मजबूत होगी।

सबक- दो: सपा को इस तरह लेना होगा सबक

यूपी में मुलायम के पिछड़ी जातियों के सर्वमान्य नेता होने की राह में लालू व नीतीश जैसे प्रतिद्वंदी भले ही न खड़े हो, लेकिन मुसलमानों को साथ रखने की चुनौती सामने जरूर खड़ी है। मौजूदा समीकरण के अनुसार सिर्फ पिछड़ों के सहारे मुलायम की पार्टी का सत्ता में लौटना काफी कठिन है। इसके लिए सपा को मुसलमानों को अपनी ओर करना होगा।

पर, यह तभी होगा जब भाजपा और मोदी से उसकी नजदीकी का संदेश न जाए। मुलायम को तुरंत इस सिलसिले में काम करना होगा। अगर, मुलायम और सपा सूबे की 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी के दिल व दिमाग में अपनी भूमिका साफ नहीं कर पाए तो उनका वोट बैंक माना जाने वाला यह वर्ग विकल्प के तौर पर बसपा की तरफ मुड़ सकता है।

पंचायत चुनाव में इसके संकेत भी सामने आ चुके हैं। मुस्लिम मतों पर दावेदारी करने वाली समाजवादी पार्टी, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम, तारिक अनवर की एनसीपी के साथ ही पप्पू यादव जैसे लोग साफ हो गए। उससे यह भी साफ हो गया है कि मुस्लिम मतदाता तभी सपा के साथ जुड़ेगा जब वह लालू-नीतीश की तरह मोदी व भाजपा को टक्कर देते हुए दिखेंगे।

कानून-व्यवस्था भी दुरुस्त करना होगा
सपा को आंकड़ों के सहारे विपक्ष के आरोपों को नकारकर संतुष्ट होने के बजाय सुशासन और विकास के एजेंडे पर काम करना होगा। पिछड़ों में भी सिर्फ एक वर्ग की पैरोकारी करने की छवि बदलकर अति पिछड़ों और दलितों के लिए भी अपनी चिंता को प्रकट करना होगा। तभी सपा यूपी से भविष्य में कुछ उम्मीद कर सकती है।

सबक- 3: मोदी तो ठीक पर यूपी के नेताओं को करना होगा आगे

(अखिलेश वाजपेयी)2017 के विस चुनाव के लिए बिहार के नतीजों ने भाजपा को साफ संदेश दे दिया है कि लोकसभा चुनाव जैसी सफलता विधानसभा चुनाव में हासिल करना आसान नहीं है। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहारे ही चुनाव लड़ने के बजाय यूपी के ही नेताओं को आगे करना होगा।

दिल्ली और दूसरे राज्यों के नेताओं को यूपी में बागडोर सौंपकर या पैराट्रूपर्स नेताओं को आगे करके मिशन यूपी का लक्ष्य नहीं साधा जा सकता। भाजपा को जातीय गणित पर भी काम करना होगा।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का विकल्प भाजपा ही दिख रही थी। जनता को मोदी बदलाव के नायक दिख रहे थे। सपा, बसपा में कोई भी केंद्र में कांग्रेस का विकल्प बनने की स्थिति में नहीं था। पर, विधानसभा के चुनाव होंगे तो मतदाता के सामने वैसी स्थिति नहीं होगी। अब केंद्र में मोदी की सरकार है। इसलिए उसके कामकाज भी कसौटी पर कसे जाएंगे। न सिर्फ आम लोग बल्कि कार्यकर्ता व समर्थक भी बिहार की तरह मोदी व भाजपा सरकार के कामकाज के आधार पर मतदान करेंगे।

स्वाभाविक है कि महंगाई और प्रदेश में कानून-व्यवस्था पर केंद सरकार की चुप्पी भी भाजपा की चुनौती होगी। जनता को इससे भी मतलब नहीं है कि विकास का मामला सीधे राज्य सरकार से जुड़ा है। इन सब पर भी भाजपा का मूल्यांकन होगा। पंचायत चुनाव में बसपा को मिले समर्थन ने इस पर मुहर भी लगा दी है।

सबक- 4: सपा की खामियों को दूर करने वालों का साथ दे सकती है जनता

लोकसभा चुनाव के बाद से जिन राज्यों में चुनाव हुए हैं, उनमें जनता ने किसी न किसी दल को स्पष्ट बहुमत देने की कोशिश की है। यूपी की बात करें, तो यहां तो इसकी शुरुआत 2007 से ही हो चुकी है। इसलिए 2017 के विस चुनाव में भी जनता उसी दल के साथ खड़ी होगी जो सपा सरकार की खामियों को दूर करने की स्थिति में नजर आएगा।

राजनीति शास्त्री प्रो. एसपीएम त्रिपाठी कहते हैं कि भाजपा यह संदेश बाहर से आने वालों को शामिल करके और दूसरे दलों के लोगों को अपने कार्यकर्ताओं व नेताओं पर तरजीह देकर नहीं कर पाएगी। नेताओं से हाथ मिलाने का मतलब उस नेता की जाति से जुड़ाव पैदा कर लेने की गारंटी नहीं है।

उल्टे बिहार की तरह यहां भी भाजपा का एक बड़ा समर्थक व समर्पित वर्ग भी तटस्थ होकर बैठ जाएगा। बिहार में भाजपा के कई स्थानीय व बड़े नेताओं को दरकिनार करके रामविलास पासवान, शंखलाल मांझी, उपेन्द्र कुशवाहा और साधू यादव जैसे नेताओं से हाथ मिलाकर, दूसरों दलों से आने वाले के सहारे लड़ाई जीतने की कोशिश का हश्र इस बात की पुष्टि करता है।

बड़बोले नेताओं पर रोक का संदेश
राजनीतिक  समीक्षकों का कहना है कि बिहार के नतीजों ने भाजपा को यूपी में ध्रुवीकरण के प्रयोग से बचने और इस तरह की भाषा बोलने वाले बड़बोले नेताओं पर रोक लगाने की नसीहत दी है। ऐसा न हुआ तो मुस्लिम भाजपा के खिलाफ लामबंद हो जाएगा। इसका फायदा सपा और बसपा जैसे ऐसे दल को होगा, जो जातीय गणित में सफल हो जाएगा।

पार्टी के भीतर गुटबाजी, बिखराव और स्थानीय नेताओं की अनदेखी पर रोक लगाने के साथ महंगाई पर विराम लगाने के उपाय तलाशने होंगे। पैराट्रूपर नेताओं से बाजी नहीं जीती जा सकेगी। साथ ही, दागियों व दलबदलुओं से हाथ मिलाने के संदेश पर विराम लगाने के साथ प्रदेश के विकास व प्रदेश की समस्याओं का समाधान तलाशने का भी संदेश देना होगा।

सबक-5: बसपा पर हो सकती है नजर

(महेंद्र तिवारी)बसपा सुप्रीमो मायावती कई सालों से लगातार यह कहती आईं हैं कि वे कोई भी चुनाव गठबंधन कर नहीं लड़ेंगी, पर यूपी में सत्ताधारी सपा बिहार में मोदी विरोधी महागठबंधन से जिस तरह अलग हुई, यहां भाजपा विरोधी और गैर सपा दलों के लिए बसपा एकमात्र उम्मीद हो सकती हैं। बस, शर्त यही है कि बसपा इसके लिए तैयार हो।

बिहार के नतीजे के बाद अब सभी की नजरें यूपी पर होंगी। लोकसभा चुनाव में यूपी व बिहार से भाजपा को जबर्दस्त कामयाबी मिली थी। यूपी में बसपा और सपा के मतों का बंटवारा भी उसकी रिकॉर्ड सफलता की वजह बना। बिहार में जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस ने इस चुनौती से निपटने के लिए महागठबंधन बनाकर अप्रत्याशित कामयाबी हासिल भी हासिल कर ली है। अब सवाल फिर खड़ा है कि क्या गैर भाजपा दल बिहार की तरह यूपी में भी एकजुटता दिखा सकते हैं।

राजनीतिशास्त्री गोपाल प्रसाद कहते हैं कि बिहार में जेडीयू व राजद जरूर एक हो गए, पर यूपी में सपा और बसपा का एक होना संभव नजर नहीं आता। दूसरा, गठबंधन न करने की बसपा की बात को सियासत में अंतिम लाइन भी नहीं मान सकते। वह पहले भी गठबंधन कर चुनाव लड़ चुकी हैं।

तीसरा, बसपा के हालात पहले से ज्यादा बदले हैं। वह पिछले कई चुनाव लगातार हारती आ रही है। सत्ता से बाहर होने की वजह से उसकी आर्थिक क्षमता भी प्रभावित होना लाजिमी है। काडर के कई नेता दल छोड़ चुके हैं। ऐसे में बसपा को यदि किसी सम्मानजनक फार्मूले से सत्ता मिलती नजर आती है तो वह उस पर गौर को तैयार हो, इससे इन्कार भी नहीं किया जा सकता है।

विपक्ष के लिए दूसरा विकल्प नहीं
विश्लेषक मानते हैं कि बसपा यूपी में 150-200 सीटें देकर समझौता नहीं कर सकती। यदि 403 में से 100 सीटें देकर कोई महागठबंधन बनाकर वे भाजपा के खिलाफ सपा से बेहतर विकल्प उभरने का अवसर देखती है, तो मन बदलने को तैयार भी हो सकती है। मुसलमान भाजपा को हराने वाले को वोट करता है और वह यूपी में निर्णायक भूमिका में रहता है। वर्तमान हालात में सपा मोदी के सीधे विरोध में नहीं जा सकती।

ऐसे में कांग्रेस, जेडीयू, राजद जैसे दलों के लिए मोदी विरोधी गठबंधन के लिए यूपी में मायावती को नेतृत्व देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। शर्त यही है कि मायावती इसके लिए तैयार हों। एक अन्य बात। पंचायत चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर बसपा ने मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल की है।

कानून-व्यवस्था और पंचायत चुनावों में सपा के लोगों ने जिस तरह मनबढ़ई की है, लोगों के मन में सपा की छवि खराब हुई है। बसपा ने भी स्मारक, पार्क की सियासत छोड़कर सिर्फ विकास का एजेंडा सामने किया है। ऐसे में बसपा का सही फैसला ही 2017 के विधानसभा चुनाव में उसे बड़ा कोण बना सकता है।
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सबक-6: वजूद बचाए रखना है तो चाहिए कोई न कोई मददगार

(शोभित श्रीवास्तव)बिहार विधानसभा नतीजों में कांग्रेस ने 4 सीटों का आंकड़ा महागठबंधन के सहारे जिस तरह 27 पर पहुंचा दिया है, उससे साफ है कि यूपी में भी उसकी गाड़ी बिना सहयोगी के आगे नहीं बढ़ सकती है। यूपी के सियासी मैदान में पहले से ही तीन बड़े व मंझे हुए खिलाड़ी सपा, बसपा व भाजपा डटे हुए हैं।

ऐसे में, पहले से हाशिए पर सिमटी कांग्रेस के लिए अपनी जगह बना पाना आसान नहीं है। बिहार में भी कांग्रेस को तभी सफलता मिली, जब वह महागठबंधन में शामिल हुई। जातीय गणित में अब कांग्रेस के पास अपने बेस-वोट जैसा ज्यादा कुछ है नहीं, अलबत्ता लालू-नीतीश की बदौलत उसकी भी दिवाली मन गई।

सियासत के जानकारों का मानना है कि कांग्रेस को अब यूपी में भी जल्द से जल्द सियासी लाइन साफ करनी होगी। दोस्त व दुश्मनों की पहचान करनी होगी। अभी यहां कांग्रेस भ्रम की स्थिति में है। उसने बीच का रास्ता अपनाया हुआ है। सत्ता पर आसीन सपा से उसकी दोस्ती जगजाहिर है, पर चुनाव दिखते ही वह सपा के खिलाफ सड़कों पर उतर जाती है। इसी दोहरी नीति के कारण उसके कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं दिखता।

...लेकिन नेतृत्व नहीं चाहता गठबंधन
यूपी कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. निर्मल खत्री कहते हैं कि सूबे में एक तरफ बसपा है, तो दूसरी ओर सपा। दोनों ही भाजपा की करीबी हैं। बसपा पहले भाजपा के साथ सरकार बना चुकी है तो सपा भी इन दिनों मोदी सरकार के पाले में खड़ी है। ऐसे में इन पार्टियों से गठबंधन का कोई मतलब नहीं है। बिहार में सपा ने महागठबंधन से अलग होकर मोदी को फायदा पहुंचाने की कोशिश की थी। बसपा ने भी यही काम किया।

गठबंधन के कारण ही यह दुर्दशा
डॉ. निर्मल खत्री मानते हैं कि यूपी में पार्टी की दुर्दशा का एक कारण गठबंधन ही है। वे कहते हैं, पहले भी यूपी में जब-जब कांग्रेस ने गठबंधन किया उसका नुकसान ही हुआ है। हालांकि, कांग्रेस कम्युनिकेशन विभाग के चेयरमैन सत्यदेव त्रिपाठी कहते हैं कि समय के अनुसार चीजें तय की जाएंगी।
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