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मां-बेटी की सियासत में बिखर रही 'पार्टी'!

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अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष मॉं-बेटी के बीच महत्वाकांक्षा की जंग थमने या शांत पड़ने का नाम नहीं ले रही है। हालांकि कृष्णा पटेल और अनुप्रिया, दोनों ही तरफ से दावा किया जा रहा है कि दल के टूटने का कोई खतरा नहीं है। पर, राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो फेमिली, कम्युनिटी व कॉस्ट आधारित दलों की इसी तरह की नियति होती है।
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भले ही दल टूटने जैसी अनहोनी अभी सामने न आए लेकिन भविष्य में ऐसा नहीं होगा, यह नहीं कहा जा सकता। वैसे भी प्रदेश में कुर्मी वर्चस्व वाले कई नेता हैं जो इस स्थिति से लाभ उठाकर अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश जरूर करेंगे।

दरअसल, मां व बेटी के बीच महत्वाकांक्षा की यह जंग अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल द्वारा अनुप्रिया पटेल की बड़ी बहन पल्लवी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने के कारण छिड़ी है।
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अनुप्रिया पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव हैं। वह सांसद भी हैं। अनुप्रिया ने इसी 20 अक्टूबर को पार्टी की राष्ट्रीय व प्रांतीय कार्यसमिति के सभी सदस्यों, मंडल व जिला अध्यक्षों की बैठक बुलाकर उसमें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद को समाप्त करने का प्रस्ताव पारित करा दिया।

साथ ही घोषणा की कि पल्लवी अपना दल की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नहीं है। मॉं को यह बात अखर गई। वह अपने फैसले पर अड़ गई। कहा, उनके फैसले पर अनुप्रिया को टीका-टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है।

शुरू है तर्क-वितर्क का दौर

अनुप्रिया का कहना है कि पल्लवी को कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है। उनकी मॉं संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं लेकिन पार्टी के संविधान के मुताबिक, उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद सृजित करने का अधिकार नहीं है।

अगर यह करना है तो उसकी निर्धारित प्रक्रिया है। राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रस्ताव लाकर और सदस्यों की सहमति से ही दल में किसी पद का सृजन किया जा सकता है। मॉं को समझना चाहिए कि संगठन, परिवार नहीं है। संगठन, परिवार की तरह नहीं चलता।

कृष्णा पटेल का कहना है कि पति सोनेलाल पटेल की मृत्यु के बाद उन्होंने दल को खून-पसीने से सींचा है। वह भी दल के नियमों को जानती हैं। अपना दल को बनाने और यहां तक पहुंचाने में उनका भी कुछ न कुछ प्रतिशत योगदान रहा है।

रही बात अनुभव की तो अनुप्रिया ने ही जब जिम्मेदारी संभाली थी तो उन्हें कितना अनुभव था। पल्लवी बड़ी है। अनुप्रिया से ज्यादा दुनिया देखी है।

दोष सपा का या चापलूसों का?

एक दिलचस्प संयोग है। दोनों तरफ से इस संकट के लिए एक-दूसरे को सीधे जिम्मेदार बताने के बजाय घुमा-फिराकर बात की जा रही है।

कृष्णा पटेल कहती है कि अनुप्रिया का दोष नहीं है। वह नादान है। वह चापलूसों के चक्कर में फंस गई है। जो उसे गुमराह कर रहे हैं। पार्टी को टूटने नहीं दूंगी। आखिरी सांस तक पति सोनेलाल पटेल की तरफ से बनाई पार्टी को बचाऊंगी।

अनुप्रिया पटेल की तरफ से आरोप लगाया जा रहा है कि उसके और भाजपा से गठबंधन के बाद से समाजवादी पार्टी काफी बेचैन है। उसे चिंता है कि गठबंधन के रहते विधानसभा चुनाव में कुर्मी वोट उसे नहीं मिलेगा। इसलिए वह कुछ लोगों को भड़काकर अपना दल को कमजोर करना चाहती है।

जनवरी में पार्टी का अधिवेशन होना है। मॉं को तब तक इंतजार करना चाहिए। वह राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। अधिवेशन में उपाध्यक्ष पद सृजित कराने का प्रस्ताव पारित करा दें। फिर जिसे चाहें उसे उपाध्यक्ष बनवा दें।
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पर, लक्षण तो शुभ नहीं

भले ही दोनों तरफ से पार्टी को न टूटने देने का दावा किया जा रहा हो लेकिन राजनीतिक समीक्षक इन लक्षणों को शुभ नहीं मानते।

वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं वर्चस्व की जो जंग शुरू हुई है, वह तभी शांत हो सकती है जब एक पक्ष अपनी महत्वाकांक्षा की बलि देने को राजी हो। जिसकी संभावनाएं दिखती नहीं है। यह पहली बार नहीं है।

पहले भी परिवार व जाति के वर्चस्व वाले दलों में टूटन होती रही है। जनता दल हो, कल्याण सिंह द्वारा बनाई गई राष्ट्रीय क्रांति पार्टी हो अथवा अन्य कुछ दल। इनका हाल सभी के सामने है। जब भी इन पार्टियों के किसी एक नेता ने दूसरे दल से जुड़ने का फैसला किया तो टूटन हो गई।

भले ही मुलायम सिंह जैसे मुखिया के रहते समाजवादी पार्टी में सब कुछ शांत दिख रहा हो। इसलिए लोग कह सकते हैं कि पार्टी व परिवार के वर्चस्व वाली पार्टियां सफल भी होती है।

पर, जहां तक मेरा मानना है कि बारीक नजर डालने पर सपा के भीतर भी कहीं न कहीं महत्वाकांक्षा व वर्चस्व के बीज दिख जाते हैं। इसलिए दावे के बावजूद पूरे विश्वास से यह नहीं कहा जा सकता है कि अपना दल का संकट पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
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