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'सांप्रदायिकता सेना में नहीं, आजम जैसे नेता फैला रहे'

Thu, 10 Apr 2014 06:53 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, लखनऊ
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धर्म या जाति के लिए नहीं देश के लिए हैं जवान कारगिल युद्घ में भारत की जीत पर सपा नेता आजम खां के बयान से शहीदों के परिजन दुखी हैं।
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उनका कहना है कि आजम खां जैसे नेता ही सांप्रदायिकता फैलाते हैं। आजम के बयान से परिजन खासे नाराज हैं।

ले. हनीफुद्दीन, कर्नल विजय राघवन, कैप्टन विक्रम बत्रा, कैप्टन मनोज पांडेय, कैप्टन अमोल कालिया, राइफलमैन मो.असलम...लंबी फेहरिस्त है कारगिल को नापाक दुश्मनों के चंगुल से छुड़ाने में अपनी जान कुर्बान कर देने वालों की।

1999 में कारगिल को कूच करते जवानों की आरती करतीं बहनें, माएं तो याद होंगी...। उनके हाथों में फूलों के हार, अक्षत और रोली भी याद होगी।

आजम खां के बयान को करारा जवाब

जवानों के सिर पर हाथ फेरते समय उस मां या बहन ने तो यह नहीं पूछा कि तुम्हारी जाति क्या है? न ही उस सपूत ने पूछा कि आरती करने वाली या दुआ में उठे हाथ हिंदू हैं या मुसलमान।

आजम खां के उस बयान कि ‘पहाड़ों पर फतह करने वाले सैनिक हिंदू नहीं मुसलमान थे’ से टीस तो उठेगी ही। ऐसी ही टीस है कारगिल शहीद के परिवारीजनों की।

सेना का मुसलमान देशभक्त, नेताओं की तरह गद्दार नहीं कारगिल युद्ध में शहीद होने वाले लखनऊ के परमवीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन मनोज पांडे के पिता गोपीचंद पांडे आजम के बयान से दुखी हैं।

कहते हैं, भारतीय सेना का मुसलमान इन नेताओं की तरह गद्दार नहीं, जो जरूरत पड़ने पर अपनी पार्टी से बेवफा हो जाते हैं। इस बयान के बाद तो यह शक भी होने लगा है कि आजम राष्ट्रभक्त हैं या नहीं।

आजम बताएं, उनके घर में कितने हुए शहीद

शहीद राइफलमैन सुनील जंग की मां वीना बिफर पड़ती हैं। वह नेताओं को कोसती हैं और कहती है कि नेताओं का कोई धर्म-ईमान नहीं होता।

आजम खां बताएं कि उनके घर के कितने लोग शहीद हुए।  

शहीद लांस नायक केवलानंद द्विवेदी की पत्नी कमला द्विवेदी की आंखें छलक पड़ती हैं।  कहती हैं, मुझे पहली बार इस बयान से पता चला कि देश के लिए युद्ध लड़ने वाला हिंदू और मुसलमान होता है।

मुझे अपने पति की शहादत पर गर्व है लेकिन इस तरह की बयानबाजी से दुख है।

आजम खां की है घ‌टिया सोंच

रिटायर्ड सूबेदार बाबू अली कहते हैं कि किसी भी नेता को सेना में नफरत के बीज नहीं बोने चाहिए। वे कहते हैं, यह केवल भारतीय सेना ही है जहां एक ही छत के नीचे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और प्रार्थना घर होता है।

आजम खां को सेना की सियासत करने की अपनी घटिया सोच को बदलना होगा।

रिटायर्ड सूबेदार मेजर एम मंसूरी कहते हैं, आजम खां का यह बयान कुंठित मानसिकता को दर्शाता है। सेना केवल अपने देश के लिए लड़ती है।

युद्ध के समय यह नहीं देखा जाता है कि मुस्लिम जवान को आगे भेजा जा रहा है या फिर हिंदू को। यदि आज भी कहीं आपसी भाईचारा है तो केवल वह भारतीय सेना में है जहां ईद और दीपावली एक साथ मनाई जाती है।

ऐसे बयानों से मुस्लिम जवानों के मनोबल पर असर

रिटायर्ड सूबेदार मेजर कुदरत हुसैन भी बयान से आहत हैं। कहते हैं कि आजम खां जैसे नेताओं के कारण ही कुछ लोगों को मुस्लिम के बारे में बोलने का मौका मिल जाता है।

भारतीय सेना में न तो धर्म के आधार पर जवानों को बांटा गया है और न ही हिंदू और मुस्लिम जैसे बंटवारे के बीच उनमें बोए गए हैं।

आजम खां के इस शर्मनाक बयान के कारण सेना में मुस्लिम जवानों के मनोबल पर विपरीत असर पड़ेगा।

बेहतर होता कि ऐसे बयान देने की जगह केवल एक दिन के लिए आजम खां सरहद पर जाएं और वहां जवानों के साथ यह देखें कि वे किन विपरीत परिस्थितियों में देश की रक्षा कर रहे हैं।

गंदी सोंच वालों को राजनीति से दूर करो

एक्स सर्विसमेन फेडरेशन ऑफ यूपी के अध्यक्ष अवकाश प्राप्त मेजर आशीष चतुर्वेदी बयान को शर्मनाक बताते हैं।

वह कहते हैं, ऐसी गंदी सोच वालों को राजनीति से दूर किया जाना चाहिए। आजम खां का यह बयान भारतीय सेना और कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिकों का अपमान है।

सरहद पर शहीद होने वाला यदि कोई सदस्य आजम खां के घर का होता तो शायद उनको शहादत का एहसास होता और वह भारतीय सेना का सम्मान करते।

राष्ट्रधर्म भूल गए आजम

रिटायर्ड मेजर एके सिंह कहते हैं कि सेना में धर्म के आधार पर कभी भेदभाव नहीं हुआ। वह कहते हैं,  आजम खां जैसे बड़े नेताओं को ऐसे बेतुके बयान से बचना चाहिए।

जातिगत सियासत के कारण आजम खां अपना राष्ट्रधर्म ही भूल गए हैं। कमांडिंग अफसर ही मुखिया, चाहे वह किसी धर्म का हो कर्नल हृदयेश कौशल बयान से आहत हैं।

कहते हैं, सेना में हिंदू और मुसलमान के आधार पर कभी जवानों को नहीं बांटा जाता है। सेना में कमांडिंग अफसर सभी जवानों का मुखिया होता है और वह किसी भी धर्म का हो लेकिन ईद और दीपावली उसके लिए एक समान होती है।

यहीं कारण है कि सेना के जवान सीधे अपने अधिकारियों से सभी त्योहार मिलकर मनाते हैं।

फौज में धर्मवाद का बीज नहीं पनपा

कर्नल दयाशंकर दुबे गर्व से कहते हैं भारतीय सेना में धर्मवाद का बीज अब तक अंकुरित नहीं हुआ।

यहां राजनीति की जगह जवान केवल देश की सुरक्षा पर अपना ध्यान रखता है।

उसका धर्म देश की रक्षा है इसलिए ही वह मातृभूमि की रक्षा करते हुए जवान सीमा पर अपने प्राण न्यौछावर कर देता है।

सेना में मुस्लिम सैनिकों की संख्या बढ़े

ऐशबाग ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली कहना है कि राजनीति का आर्मी में कोई दखल नहीं होना चाहिए। क्योंकि जिस मुल्क में राजनीति का आर्मी में दखल होता है। उस देश को बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है।

उसकी सबसे बड़ी मिसाल पाकिस्तान है और हम ये समझते हैं कि हमारे मुल्क में यह कानून बने, कि कोई भी आर्मी अफसर सेवानिवृत्ति के बाद भी चुनाव नहीं लड़ेगा, जिससे आर्मी की गरिमा बनी रहे।

जिस तरह से मुसलमानों का सिविल सर्विसेज में तादात कम है उसी तरीके से आर्मी में भी 3 से 4 फीसदी मुसलमान है। जबकि आबादी के मुताबिक उनकी तादात बढ़ाई जानी चाहिए।

यह तमाम सैनिक पूरी बहादुरी के साथ अपने मुल्क की सरहदों की हिफाजत करते हैं, क्योंकि हमारे मजहब ए इस्लाम में अपने मुल्क की सरहदों की हिफाजत करना एक इबादत है।
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सेना में भी सांप्रदायीकरण चाहती है सपा

कांग्रेस ने प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खां की कारगिल युद्ध को लेकर की गई टिप्पणी की निंदा की है।

पार्टी प्रवक्ता वीरेंद्र मदान ने कहा कि सपा नेता अब सेना का भी सांप्रदायीकरण कर देंगे। कहा देश की जनता समझदार है आजम की टिप्पणी के बहकावे में नहीं आएगी।

वह समझती है कि सेना धर्म व संप्रदाय से ऊपर उठकर अपनी जानों की कुर्बानी देकर देश की रक्षा करती है।

उनको धर्म के आधार पर बांटना आजम की ओछी मानसिकता का परिचायक है।
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