महाराजगंज में 12 जमींदार परिवार हैं। इनके पास दो हजार एकड़ से भी ज्यादा जमीन है।
1900 में से 18 परिवारों के पास तीन एकड़ जमीन है। बाकी के पास कोई जमीन ही नहीं।
बुधवार को पर्यटन भवन में रोजगार हक अभियान में हुई जनसुनवाई में जमीन पर अधिकार नहीं होने का मुद्दा उठा।
महाराजगंज से आए मुसहर सेवा संस्थान के दिनेश सिंह ने बताया कि उनके यहां आज भी चंद परिवार ही पूरी जमीन पर कब्जा किए हुए हैं।
12 परिवारों की खेती हमेशा जलमग्न रहती है। वहीं, छह लोगों की भूमि जंगल और पानी से घिरी हुई है। उनके समर्थन में सोशल एक्टिविस्ट संजय विजयवर्गीय ने बताया कि प्रदेश में भूमि आवंटन मजाक बनकर रह गया है। बड़े शर्म की बात है कि आज भी 84 प्रतिशत ग्रामीण खेतिहर मजदूरों में से 38 प्रतिशत भूमिहीन हैं।
एक्शन एड संस्था के कार्यक्रम प्रबंधक अरविंद कुमार ने कहा कि आज़ादी के बाद भूमि सुधार तो हुआ लेकिन, तमाम संवैधानिक उपबंधों के बाद भी सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक रूप से वंचित तबकों तक इसका लाभ नहीं पहुंचा।
आज भी इनके पास न तो आवासीय भूमि है, न ही कृषि योग्य भूमि। बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें पट्टाधारक का पट्टा होने के बरसों बाद भी उस जमीन पर उसका कब्जा नहीं हो पाया।
कमेरी दुनिया के संपादक और दलित चिंतक आरए दिवाकर ने कहा, यह दु:खद है कि आज़ादी के 66 साल बाद भी दलित भूमिहीनों को आवासीय और कृषि योग्य भूमि के लिए भटकना पड़ रहा है। इस दौरान संयोजक अजय शर्मा और विज्ञान फाउंडेशन के संदीप खरे ने भी अपनी बात रखी।
कॉरपोरेट लूट के शिकार दलित
एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने कहा कि मौजूदा दौर में कॉरपोरेट की लूट ने दलित और आदिवासी समुदाय के लोगों को भूमि से वंचित किया है। हमारी सरकारों ने ऐसी नीतियां बनाई हैं, जिससे गरीबों और वंचितों के हिस्से की जमीन पूंजीपतियों को औने-पौने दी जा रही है।
जब दलित आदिवासी अपनी भूमि के लिए संघर्ष करता है तो उस पर लाठियां बरसाई जाती हैं। उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाता है।
महिला किसानों से सौतेला व्यवहार
एक्शन एड की कार्यक्रम अधिकारी मनीषा ने कहा, भारतीय समाज में शुरू से ही महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है। जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह यहां भी महिलाएं उपेक्षा की शिकार हैं। उनके नाम पर न तो आवासीय पट्टे हैं और न ही कृषि योग्य भूमि।
यह कहानी सिर्फ दलित और आदिवासी समाज की महिलाओं की नहीं बल्कि सभी महिलाओं की है।