सभासद के चुनाव में 60 के दशक से उनका चुनावी राजनीति का सफर शुरू हुआ । कांग्रेस के महेशनाथ शर्मा सभासद थे लेकिन उनकी मृत्यु के बाद चुनाव में जनसंघ ने टंडन को उम्मीदवार बनाया। वह दो बार सभासद चुने गए साथ ही जनसंघ सभासद दल के नेता भी रहे। दो बार विधान परिषद के सदस्य रहे। भाजपा के विभिन्न पदों पर पदाधिकारी रहे टंडन ने प्रवक्ता की भी जिम्मेदारी संभाली।
प्रदेश सरकार में तीन बार मंत्री रहे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में लखनऊ संसदीय सीट से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन कांग्रेस के पक्ष में चल रही सहानुभूति लहर के सामने जीत नहीं सके। पर, लखनऊ लोकसभा से उन्हें सफलता व जीत 2009 में अटल बिहारी वाजपेयी की जगह भाजपा का प्रत्याशी बनने पर हासिल हुई और लोकप्रियता भी साबित कर दी।
वैसे टंडन 1996 से 2009 तक लखनऊ पश्चिम से लगातार विधायक रहे। उन्होंने विधानपरिषद में नेता सदन की भी जिम्मेदारी संभाली तो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका का भी निर्वाह किया।
सभासद के बाद 1978 से 1984 तक और 1990 से 96 तक दो बार विधानपरिषद के सदस्य रहे। इस दौरान 1991-92 की उत्तर प्रदेश सरकार में वह मंत्री भी रहे। इसी सरकार में अयोध्या मामले का प्रभारी मंत्री भी बनाया गया। इसके बाद 1996 से 2007 तक लगातार तीन बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे ।
उन्होंने प्रदेश में नगर विकास मंत्री, आवास और ऊर्जा मंत्री की भूमिका का भी निर्वाह किया। वर्ष 2009 में वह अटल बिहारी वाजपेयी की जगह लोकसभा चुनाव लड़कर सांसद बने । उन्हें साल 2018 में बिहार के राज्यपाल की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। फिर उन्हें मध्य प्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया। उनके बड़े पुत्र आशुतोष टंडन इस प्रदेश सरकार में नगर विकास मंत्री हैं।
राज्यपाल लालजी टंडन के साथ पूर्व सीएम शिवराज (फाइल फोटो)
- फोटो : Amar ujala
लालजी टंडन की मृत्यु के साथ मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के एक दुर्योग की कहानी भी रच गई। टंडन प्रदेश के ऐसे तीसरे राजनेता रहे जिनकी मध्य प्रदेश का राज्यपाल रहते मृत्यु हुई है। टंडन से पहले भाजपा नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्त वह शख्स थे जिनकी मध्य प्रदेश का राज्यपाल रहते बीमारी से मृत्यु हुई थी।
कांग्रेस सरकार ने प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे रामनरेश यादव को मध्य प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। रामनरेश यादव भी बीमार हुए और उनकी राज्यपाल रहते मृत्यु हो गई। लालजी टंडन मुख्यमंत्री तो नहीं रहे लेकिन हैसियत इनकी भी मुख्यमंत्री जैसी ही थी।
मध्य प्रदेश का राज्यपाल रहते टंडन भी बीमार हुए और मृत्यु हो गई। यह भी मात्र नियति का एक योग ही है कि ये तीनों व्यक्ति किसी न किसी रूप में आपातकाल के संघर्ष और उसके बाद 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार से जुड़े थे। जहां रामनरेश यादव उस सरकार के मुख्यमंत्री, रामप्रकाश गुप्त उस सरकार में उद्योग मंत्री थे और जनसंघ के चेहरा थे। लालजी टंडन ने इसी सरकार में विधानपरिषद के जरिये विधानमंडल की यात्रा शुरू की थी।