भले ही लखीमपुर घटना को लेकर भाजपा खुद को सामान्य दिखा रही, लेकिन इसने उसकी चिंता और चुनौती निश्चित रूप से बढ़ा दी है। सरकार ने इस मामले में तत्परता से कार्रवाई करते हुए भले ही इस घटना से प्रभावित हुए परिवारों के गुस्से और गम को कम करने के साथ इसकी प्रतिक्रिया के फैलाव पर नियंत्रण लगाने की कोशिश की हो लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इससे विपक्ष को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। इसके जरिये वह उत्तर प्रदेश में लोगों को सरकार के खिलाफ लामबंद करने की कोशिश जरूर करेगा । यह बहस का विषय है कि राजनीतिक समीकरणों के मद्देनजर उसके लिए सिर्फ इस मुद्दे के सहारे अपनी कामयाबी की कहानी लिखना कितना आसान होगा?
यह कहना तो गलत होगा कि इस घटना ने भाजपा के प्रभाव और लोगों की उसके साथ लामबंदी को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया है लेकिन बीते 24 घंटे की घटनाओं पर गहराई से नजर दौड़ाएं तो समझ में आ जाएगा कि सियासी पिच पर आक्रामक पारी खेल रही इस पार्टी को अकेली एक घटना के कारण रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर होना पड़ा है। गलती किसकी थी और किसने साजिश करके इस घटना को इतना दुखद और दुस्साहसी स्वरूप दिया, यह तो जांच के बाद सामने आएगा।
पर, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लखीमपुर सहित पिछले दो महीने में घटी कुछ घटनाओं ने भाजपा को अपनी पार्टी के नेताओं के परिवार के सदस्यों की भूमिका तथा प्रदेश सरकार को सरकारी मशीनरी खासतौर से पुलिस के व्यवहार पर कड़ाई से नजर रखने की जरूरत भी समझा दी है। कहीं ऐसा न हो कि किसी एक की गलती भाजपा सरकार के सारे प्रयासों पर भारी पड़ जाए। साथ ही चुनावी वर्ष में अभी तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिमटे आंदोलन को मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में फैलाने की विपक्ष की कोशिश सफल हो जाए।
सवालों का जवाब तो ढूंढना ही होगा
राजनीतिक समीक्षक प्रो. एपी. तिवारी कहते हैं कि इस घटना के चलते जनता विपक्ष को सरकार या भाजपा के खिलाफ अपने सिर आंखों पर नहीं बैठा लेगी और न राजनीतिक परिस्थिति बदल जाएगी। जिस तरह सार्वजनिक हुए वीडियो में भीड़ के कुछ लोग दुर्दांत तरीके से लोगों को मार रहे हैं। गाड़ियां जला रहे हैं उससे किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वालों की भूमिका भी कठघरे में है। बावजूद इसके कुछ सवाल जरूर है जिनके जवाब भाजपा को तलाशने होंगे।
भले ही घटनास्थल पर केंद्रीय गृह राज्यमंत्री का पुत्र न रहा हो लेकिन यह जानते हुए कि अमुक मार्ग पर किसान धरना दे रहे हैं या एकत्र हैं उधर, उनके पुत्र की गाड़ी का पहुंच जाना लोगों को सवाल का मौका तो देता ही है। साथ ही अभी तक पश्चिम में सिमटे आंदोलन को तराई व पूर्वी उत्तर प्रदेश में फैलने की हवा भी दे रहा है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता भी निजी बातचीत में स्वीकार करते हैं कि इस तरह की घटनाएं परिवारवाद की विरोधी पार्टी में परिवार के लोगों की सियासी सक्रियता को लेकर हमारे लिए आत्मचिंतन की जरूरत खड़ा कर रही हैं।
विपक्ष को ऑक्सीजन तो मिल ही गई
बात सही है। इस घटना के तथ्य क्या हैं यह अलग मुद्दा है लेकिन दम तोड़ रहे विपक्ष को इसने आक्सीजन तो दे ही दी है। वे इसके सहारे अपने पैर पसारने की कोशिश में जुट गए हैं। सफल कितना होंगे? यह अलग सवाल है। भाजपा को इस मोर्चे पर भी नजर रखनी होगी ताकि विपक्ष कामयाब न हो। बाबासाहब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. शशि कांत पांडेय कहते भी हैं कि अभी तक इस आंदोलन का असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ सीमित इलाकों में ही छिटपुट दिख रहा था।
सरकार इसे सीमित रखने में सफल रही थी। जिसका भाजपा को कोई राजनीतिक नुकसान नहीं दिख रहा था। पंजाब में तो भाजपा का वैसे भी बहुत कुछ दांव पर नहीं था। ऊपर से केंद्र सरकार भले ही संबंधित किसान कानूनों को वापस नहीं ले रही थी लेकिन उसने और प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार किसानों के लिए अन्य जो कदम उठा रही थी उससे भी इस आंदोलन को आम लोगों को समर्थन नहीं मिल पा रहा था।
पर, लखीमपुर की घटना ने एक ही दिन में इसे उत्तर प्रदेश में भी चर्चा में ला तो दिया ही। हालांकि चुनाव में कोई एक फैक्टर ही नतीजे तय नहीं कर देता है लेकिन उसका असर तो पड़ता ही है। सरकार और भाजपा संगठन को इसके मद्देनजर भी काम करना पड़ेगा। जिसकी अभी तक कोई जरूरत नहीं दिख रही थी।