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लाखी दरवाजा (पार्ट 4): वाजिद अली ने यहीं से ली विदा

Sun, 20 Oct 2013 05:04 PM IST
टीम डिजिटल/लखनऊ
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कैसरबाग बारादरी के पूर्व-पश्चिम में दो केसरिया दरवाजे हैं, जिनको लाखी दरवाजा कहा जाता है।
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लाखी दरवाजे पहले भी कैसरबाग की शोभा थे। हां, जिस अनुपात में कैसरबाग बेरौनक हो चुका है। कम लोग जानते होंगे कि इसी की हद में आज का प्रेस क्लब बनाया गया है।

नवाब वाजिद अली शाह ने सन् 1850 में कैसरबाग के लाखी दरवाजे, एक लाख रुपए में बनवाए थे। अगर इसके बनावट की बात करें, तो तीन दर वाले फाटकों पर चार बुर्ज बने हैं और बीच में मार्टिन के मकबरे वाली सीढ़ीदार चौपड़ जो बहुत खूबसूरत नजारा पेश करता है।
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पहले इसके ऊपरी हिस्से पर सुनहरे गुंबद का छत्र रखा रहता था और उसी पर सल्तनत अवध का झंडा लहराया करता था। यहां मौजूद बनी मेहराबों पर तीन मछलियां बनी हुई हैं, जो दस्तूरे अवध का निशाने मुबारक हैं।

इन मछलियों के बीच में आसफी गुलदस्ता बना हुआ है जिसे हिंदईरानी बूटा कहते हैं। लाखी दरवाजे की एक और खासियत यह है कि फाटकों में हरमसरा की तरफ त्रिपोलिया है जबकि इसके दूसरी तरफ बस एक ही द्वार है।

पूरब वाले दरवाजे के पूरब में पहले शहंशाह मंजिल, सुल्तान मंजिल फलक सैर मंजिल और चौलक्खी कोठी की शानदार इमारतें थीं। यह फाटक नवाब वाजिद अली शाह के राज्यहरण और नगर बिदा की दुखद गाथा का गवाह है।

नवाब 13 मार्च 1857 की रात अपने महल से निकले थे। नगर की जनता इसी पूर्वी फाटक पर अपने आलम की रुखसत करने के लिए खड़ी थी।

सबकी आंखों में आंसू था। लोगों ने चिल्लाकर-चिल्लाकर कहा, खुदा शाह को सलामत रखे, लंदन से हुक्म आ जाए, राजगद्दी मिल जाए लेकिन उस दिन जो बादशाह लखनऊ छोड़कर गए, तो फिर कभी वे दोबारा न आ सके।
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पश्चिम वाले दरवाजे के बाहर कोठी कैसर पसंद और गोलागंज की सड़क थी।

इस दरवाजे के पाए पर, पत्थर पर उत्कीर्ण कुछ मत्स्य पुरुष और दूसरी कृतियां हैं जो इस इमारत का अंश कभी नहीं थीं सिवा इसके कि वो पत्थर कहीं और से लाकर लगाए गए हैं।

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