चुनौती-1: किसान की खेती का दारोमदार अधिकाधिक सिंचाई पर टिका है। धान व गन्ना की फसल पर सिंचाई का बड़ा खर्च आता है। सिंचाई डीजल से होती है और डीजल की दरें रॉकेट की रफ्तार की तरह बढ़ रही है। जनवरी की शुरुआत में जो डीजल 74.19 रुपये प्रति लीटर था, मई में बढ़कर 83.89 रुपये पहुंच चुका है। साढ़े चार महीने में 9.70 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि। यह बढ़ोत्तरी कब थमेगी और कहां जाकर थमेगी, कुछ पता नहीं है। डीजल की बढ़ती कीमतों ने किसानों का सारा गुणा भाग बर्बाद कर दिया है।
चुनौती-2: कोविड काल में आंशिक कोरोना कर्फ्यू लगा हुआ है। कहने को कृषि संबंधी क्रियाकलाप इसके प्रतिबंध से बाहर है लेकिन, तमाम जिलों के हाट-बाजार से इस तरह की खबरें आ रही हैं कि किसान अपना फल-सब्जी तक ठेला, दुकान पर बेचने को नहीं पा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अपनी हरी सब्जी औने-पौने दाम में बेचने को मजबूर है। आम को आंधी-तूफान जमकर नुकसान पहुंचा रहे हैं। टमाटर सड़ने की नौबत है। होटल, रेस्टोरेंट बंद होने से दूध की खपत घट गई है। उत्पादों का ठीक से दाम नहीं मिल पा रहा है।
चुनौती-3: छुट्टा पशुओं की समस्या स्थाई रूप से किसानों के जी का जंजाल बनी हुई है। गौ सरंक्षण केंद्र में छुट्टा पशुओं को रखने की योजना का खास फायदा नहीं हुआ। किसानों को पशुओं से अपनी फसल को बचाने के लिए बाड़ेबंदी करनी पड़ रही है। इस अतिरिक्त खर्च ने खेती की लागत को बहुत मंहगा कर दिया है। एक एकड़ खेत की बाड़ेबंदी पर 2000-5000 रुपये प्रति फसल खर्च बढ़ गया है। कोई लकड़ी की बाड़ेबंदी कर रहा है तो कोई तार, कोई प्लस्टिक की रस्सी बांध रहा है तो कोई कपड़े से घेरेबंदी करने को मजबूर है।