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यूपी: तिहरी चुनौतियों से परेशान प्रदेश का किसान, योगी सरकार से चाहे पैकेज का एलान

Sat, 22 May 2021 06:18 PM IST
ishwar ashish महेंद्र तिवारी, अमर उजाला, लखनऊ

सार

यूपी के किसान प्रदेश सरकार से पैकेज चाहते हैं जो कि उन्हें राहत पहुंचाए। लगातार बढ़ती डीज़ल की कीमतों ने भी उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कोविड महामारी काल में सरकार सबकी मुश्किलों की चिंता करने का संदेश देने में जुटी है। पर, तिहरी चुनौतियों का सामना कर रहे किसानों की सहूलियत पर ध्यान नहीं जा रहा है। किसान चाहते हैं सरकार यदि उन्हें बिजली से मुफ्त सिंचाई की सुविधा भी दे दे तो उन्हें खेती-किसानी में बड़ी राहत मिल जाएगी।

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प्रदेश के किसान रोज-रोज महंगे होते डीजल व बाड़बंदी से बढ़े खर्च से परेशान थे ही, कोविड काल में फल-सब्जी व दूध की खपत घटने से इनका अर्थतंत्र पूरी तरह से बिगड़ गया है। अपने उत्पाद की उचित कीमत न मिल पाने से बेहद परेशान हैं। गोंडा में भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के जिला महासचिव किसान राजेश्वर तिवारी कहते हैं कि खेती की लागत में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इससे किसान बहुत परेशान हैं।

सरकार को खेती की लागत में वृद्धि का आकलन कर किसानों के लिए एक राहत पैकेज का एलान करना चाहिए। डीजल व बाड़ेबंदी पर बढ़े खर्च के लिए सब्सिडी का एलान होना चाहिए। वर्तमान में खरीफ की तैयारी शुरू हो गई है। इस फसल में धान, गन्ना, मक्का आदि की अच्छी खेती होती है। धान व गन्ना में किसानों को सिंचाई में बड़ी पूंजी लगानी पड़ती है।
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किसान अंबर प्रसाद शुक्ला का कहना है कि सरकार को किसानों के बढ़ते खर्च को ध्यान देते हुए बिजली से मुफ्त सिंचाई की सुविधा का एलान तत्काल करना चाहिए। इससे किसानों को फौरी तौर पर राहत मिल सकेगी। फिर मुकम्मल राहत पैकेज देना चाहिए। बहराइच के किसान जितेंद्र द्विवेदी कहते हैं कि यदि सरकार किसानों को उनकी खेती के हिसाब से मनरेगा से मदद का फार्मूला तैयार करे तो स्थाई रूप से किसानों की समस्या का हल हो सकता है।

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किसानों के सामने ये हैं तीन प्रमुख चुनौतियां

चुनौती-1: किसान की खेती का दारोमदार अधिकाधिक सिंचाई पर टिका है। धान व गन्ना की फसल पर सिंचाई का बड़ा खर्च आता है। सिंचाई डीजल से होती है और डीजल की दरें रॉकेट की रफ्तार की तरह बढ़ रही है। जनवरी की शुरुआत में जो डीजल 74.19 रुपये प्रति लीटर था, मई में बढ़कर 83.89 रुपये पहुंच चुका है। साढ़े चार महीने में 9.70 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि। यह बढ़ोत्तरी कब थमेगी और कहां जाकर थमेगी, कुछ पता नहीं है। डीजल की बढ़ती कीमतों ने किसानों का सारा गुणा भाग बर्बाद कर दिया है।

चुनौती-2: कोविड काल में आंशिक कोरोना कर्फ्यू लगा हुआ है। कहने को कृषि संबंधी क्रियाकलाप इसके प्रतिबंध से बाहर है लेकिन, तमाम जिलों के हाट-बाजार से इस तरह की खबरें आ रही हैं कि किसान अपना फल-सब्जी तक ठेला, दुकान पर बेचने को नहीं पा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अपनी हरी सब्जी औने-पौने दाम में बेचने को मजबूर है। आम को आंधी-तूफान जमकर नुकसान पहुंचा रहे हैं। टमाटर सड़ने की नौबत है। होटल, रेस्टोरेंट बंद होने से दूध की खपत घट गई है। उत्पादों का ठीक से दाम नहीं मिल पा रहा है।

चुनौती-3: छुट्टा पशुओं की समस्या स्थाई रूप से किसानों के जी का जंजाल बनी हुई है। गौ सरंक्षण केंद्र में छुट्टा पशुओं को रखने की योजना का खास फायदा नहीं हुआ। किसानों को पशुओं से अपनी फसल को बचाने के लिए बाड़ेबंदी करनी पड़ रही है। इस अतिरिक्त खर्च ने खेती की लागत को बहुत मंहगा कर दिया है। एक एकड़ खेत की बाड़ेबंदी पर 2000-5000 रुपये प्रति फसल खर्च बढ़ गया है। कोई लकड़ी की बाड़ेबंदी कर रहा है तो कोई तार, कोई प्लस्टिक की रस्सी बांध रहा है तो कोई कपड़े से घेरेबंदी करने को मजबूर है।
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