किसी छात्र के साथ चाय पीते या गप्पे लगाते। कोई न होता तो रेस्तरां के मालिक टाइगर पंडित से ही बतिया लेते। इसके बाद वह अंदर कमरे में जाकर कहानी लिखते तो टाइगर पंडित से आग्रह करके रेडियो ऑन करा देते। रेडियो पर संगीत बजता और जोशी कहानी लिखते रहते।
संगीत सुनते कहानी लिखना उन्हें काफी अच्छा जो लगता था। कहानी पूरी हुई। जोशी ने इसका नाम रखा ‘धुआं।’ इस कहानी को उन्होंने ‘सरगम’ के संपादक ख्वाजा अहमद अब्बास के पास छपने को भेजा। ख्वाजा साहब को पता था कि जोशी ने यह कहानी रेस्तरां में बैठकर और वह भी रेडियो पर संगीत सुनते हुए लिखी है। उन्होंने कहानी का शीर्षक बदलकर ‘और गीत बंद हो गए’ कर दिया।’