13 साल पहले विवेकानंद पॉलीक्लीनिक में हार्निया के ऑपरेशन में लापरवाही की वजह से मिले दर्द पर जिला उपभोक्ता फोरम ने मरहम लगाने का काम किया है।
इस मामले में डॉक्टर ने हार्निया के लैप्रोस्कोपिक विधि से ऑपरेशन में मरीज को इलाज की जगह स्थाई बीमारी दे दी थी।
इलाज में लापरवाही के इस मामले में फोरम ने गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी सर्जन डॉ. अभिजीत चंद्रा और विवेकानंद पॉलीक्लीनिक को मरीज को एक लाख रुपये क्षतिपूर्ति और 5,000 रुपए विधिक व्यय देने का आदेश दिया है।
वर्तमान में केजीएमयू के सर्जिकल गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अभिजीत चंद्रा ने तीन अप्रैल 2000 को एचएएल कर्मी बीएल गुप्ता का हार्निया का ऑपरेशन किया था।
लैप्रोस्कोपिक विधि से हुई इस सर्जरी में मरीज को सिंथेटिक प्रोलिन मैश (एक तरह की जाली) लगाई गई।
ऑपरेशन थिएटर से निकलते के बाद मरीज ने तेज दर्द की शिकायत की और पेशाब आने में दिक्कत बताई।
इस उन्हें फिर से ऑपरेशन थिएटर में ले जाकर कैथेटर लगा दिया गया। पांच दिन बाद भी मरीज का दर्द बंद न होने के बावजूद उसे डिस्चार्ज कर दिया गया।
फोरम प्रथम के अध्यक्ष विजय वर्मा ने अपने आदेश में कहा कि गलत तरीके से किया गया ऑपरेशन, चिकित्सा सेवा में गंभीर लापरवाही है।
इसके लिए क्षतिपूर्ति विवेकानंद हास्पिटल और डॉ अभिजीत चंद्रा को संयुक्त रूप से करनी होगी। इसके लिए दोनों पक्षों को 30 दिन का समय दिया गया है।
एक साल भटक ता रहा मरीज
2003 में वाद दायर करने वाले वादी बीएल गुप्ता की शिकायत थी कि राहत न मिलने पर 22 नवंबर को वह केजीएमयू गया। यहां भी राहत नहीं मिलने पर एचएएल हॉस्पिटल ने उसे एसजीपीजीआई रेफर कर दिया। इस बीच करीब एक साल तक मरीज दर्द से तड़पता रहा।
30 अप्रैल 2001 को ब्लू क्रॉस हॉस्पिटल में यूरोलॉजिस्ट डॉ. राजेश्वर कृष्णन ने मरीज की सिस्टोस्कोपी कराई। 11 मई को हुए ऑपरेशन में डॉक्टर ने पाया कि पहले के लैप्रोस्कोपिक हार्नियोप्लास्टी में लगाई गई मैश यूरिनरी ब्लेडर के छेद में धंसी हुई थी।
डॉ. कृष्णन के मुताबिक, इसी वजह से दर्द हो रहा था। इससे यूरिन इंफेक्शन भी हो रहा था। 17 मई को मैश निकाल दिया गया। डॉ. कृष्णन ने मरीज को बताया कि पहले के ऑपरेशन की वजह से हार्निया को जो नुकसान हुआ है उसे ठीक नहीं किया जा सकता।
गलत तरीके से ऑपरेशन और लापरवाही की वजह से यूरिनरी ब्लेडर में एक छेद हो गया था इसकी वजह से मैश ब्लेडर में घुस गया। इससे यूरिन रुकने के साथ संक्रमण हो रहा था।
बचाव नहीं आया काम
डॉ. चंद्रा का कहना था कि मरीज को पहले ही ऑपरेशन के नुकसान-फायदे के बारे में बता दिया गया था। इस दौरान सर्जरी के खतरे भी बताए गए थे। वादी के वकील अशोक कुमार का कहना था कि वाद दायर होने के बाद 10 साल से मरीज को न्याय का इंतजार था।
यह फैसला ऐतिहासिक है, इससे दूसरे पीड़ित मरीजों को भी राहत मिलेगी।