आमतौर पर ऐसे केस में कोलन सिस्टम से ऑपरेशन किया जाता है। पर इस बार तय किया कि ऊतक इंजीनियरिंग के जरिए आहारनाल विकसित करेंगे। इस तरह का प्रयोग 1994 में जापान के डाक्टर किमूरा ने किया था। उन्होंने ऊतक इंजीनियरिंग का प्रयोग करके एसोफेजेल लांगिथिंग की नई तकनीक तैयार की थी। उसी आधार पर इस बच्चे की आहार नाल को पहली बार बढ़ाने की कोशिश की गई। जिसमें सफलता प्राप्त हुई। इस पूरे ऑपरेशन में मरीज के परिजनों को सिर्फ 35 हजार रुपये खर्च करना पड़ा।
प्रोफेसर कुरील के मुताबिक, एक दिन के बच्चे का यह ऑपरेशन काफी जटिल था। पहले लार निकलने और दूध पिलाने के लिए अलग-अलग ट्यूब लगाई गई। फिर संक्षिप्त आहार नाल को विकसित करने के लिए एसोफैगल पाउच लगाया गया। आहार नाल को खींचकर देखा गया तो उसमें खिंचाव की गुंजाइश दिखी। थोड़े दिन बाद दोबारा जांच की गई तो वह बढ़ती हुई मिली।
ऐसे में 2013 में दोबारा ऑपरेशन किया गया और ऊतक इंजीनियरिंग अपनाई गई। इससे आहारनाल में तेजी से विकास हुआ। फिर 2015 और 2017 में आहार नाल को और बढाया गया। इस दौरान देखा गया कि आहारनाल अपनी लंबाई पूरी कर रही है। इसके बाद छह सितंबर 2018 को अंतिम ऑपरेशन किया गया। इसमें विकसित आहारनाल को पसलियों के नीचे से हार्ट को बचाते हुए आमाशय तक ले जाया गया। फिर उसे थोरैक्स के माध्यम से पेट के हिस्से में जोड़ दिया गया। सप्ताहभर बाद बच्चा पूरी तरह स्वस्थ हो गया। अब वह बिना किसी कठिनाई के सभी चाकलेट, खिचड़ी, रोटी सब खा सकता है।
ऑपरेशन करने वाली टीम में प्रोफेसर कुरील के साथ डा. अर्चिका गुप्ता, डा. विपुल बोथरा, डा. सुनील कनौजिया, डा. अखिलेश एवं एनेस्थिसिया से डा. अनीता मलिक, डा. जीपी सिंह, डा. सरिता सिंह, नर्स वंदना एवं टेक्नीशियन संजय रहे।
टिश्यू इंजीनियरिंग में नए कनेक्टिव टिश्यूज तैयार किए जाते हैं। इन्हीं के माध्यम से संबंधित हिस्से को विकसित किया जाता है। फिर उसे ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है। यह काफी बारीकी से करना पड़ता है।
इस तरह पता चलता है
आहार नाल विकसित नहीं होने पर बच्चे के मुंह से लार बाहर निकलती रहती है। वह बेचैन रहता है। दूध नहीं पीता। मुंह में दूध जाते ही बाहर निकल जाता है। उसके पेट में गैस नहीं होती है। एक्सरे की जांच कराने से आहार नाल की स्थिति दिखने लगती है।
पुरानी विधि और नई विधि में अंतर
अभी तक बड़ी आंत से आहारनाल को बनाया जाता रहा पर इस तकनीक में पेट में अधिक एसिड बनने पर दिक्कत होती है। कई बार सांस लेने भी दिक्कत होती है।