एसजीपीजीआई व सीडीआरआई ने मिलकर करीब 100 सैंपल की जीनोम सीक्वेंसिंग की थी। सूत्र बताते हैं कि राजधानी सहित आठ जिलों से आए सैंपल में भिन्नता नहीं पाई गई है। ज्यादातर मरीजों में दिल्ली में मिला ए-2-ए स्ट्रेन पाया गया है। इसका प्रभाव सामान्य बताया जा रहा है।
इस संबंध में एसजीपीजीआई की माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. उज्ज्वला घोषाल का कहना है कि यह जांच काफी महंगी होती है। ब्रिटेन से आने वाले सभी लोगों के सैंपल की जिनोम सीक्वेंसिंग की बात कही जा रही है।
शासन से निर्देश मिलने पर जीनोम सीक्वेंसिंग की जाएगी। अभी यहां प्रायोगिक तौर पर किया गया है। संबंधित सैंपल को आईसीएमआर भी भेजा गया है।
सवाल- जीनोम सीक्वेंसिंग है क्या?
जवाब- जीनोम किसी जीव की कुंडली है। जीव कैसा होगा, कैसा दिखेगा, यह सब कुछ जींस तय करते हैं। इन्हीं जींस के विशाल समूह को जीनोम कहते हैं। जींस की सीक्वेंसिंग जानने को ही जीनोम सीक्वेंसिंग कहते हैं।
सवाल- स्ट्रेन क्या है?
जवाब- स्ट्रेन को आसान शब्दों में जेनेटिक वैरिएंट कह सकते हैं। यह सबकुछ वैसे ही जैसे एक ही कंपनी की कारें अलग-अलग वैरिएंट में आती हैं। एक ही मॉडल के अलग-अलग वैरिएंट की क्षमता अलग-अलग होती है।
सवाल- अभी ये चर्चा में क्यों है?
जवाब- हाल ही ब्रिटेन में कोरोना के नए एवं खतरनाक स्ट्रेन का पता चला। अब किसी में वायरस का वह स्ट्रेन तो नहीं इसके लिए उसकी कुंडली (जीनोम सीक्वेंसिंग) को खंगालना जरूरी होगा।
सवाल- इसके बारे में हमें जानने की जरूरत क्यों है?
जवाब- विशेषज्ञों का कहना है कि लैब में वायरस के आरएनए से उसके रूपांतरित होने के बारे में सटीक जानकारियां मिल सकती हैं। सीक्वेंसिंग से प्राप्त जानकारी से वैक्सीन के विकास में भी मदद मिल सकती है।
सवाल- इसका हमारे लिए संदेश क्या है?
जवाब- अब तक कोरोना वायरस के 17 तरह के स्ट्रेन के बारे में जानकारी मिली है। अपने ही देश में करीब 10 तरह के स्ट्रेन पाए गए हैं। भारत में कोरोना का सबसे ज्यादा ए-2-ए स्ट्रेन मिला है। इसके अलावा बी-4, बी, ए-3-ए, ए-1-ए, बी-1, ए-3-आई, आदि भी पाए गए हैं। इनमें तेजी से फैलने वाले ए-3-आई को ज्यादा खतरनाक माना जाता है। किसी को भी यह बताया जाए कि कोरोना वायरस के इतने रूप सामने आ चुके हैं तो हम ज्यादा सजग रहेंगे।