देश में बढ़ रही असहिष्णुता के विरोध में पुरस्कार लौटाने के मुद्दे पर केंद्र सरकार के मंत्रियों और संघ से जुडे़ लोगों के बयान साहित्यकारों को और बल दे रहे हैं।
कई महत्वपूर्ण पुरस्कारों से सम्मानित प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह का कहना है कि जिस तरह सत्ता पक्ष के बयान आ रहे हैं, उससे साफ है कि साहित्यकार अपने प्रतिरोध का जो संदेश पहुंचाना चाहते थे, वह पहुंच रहा है।
लड़ाई अभी और आगे चलेगी। यूं तो देश भर से कई प्रमुख कवि और आलोचक प्रदेश की राजधानी लखनऊ में समकालीन कविता पर विमर्श के लिए जुटे थे, लेकिन समय के संकट और पुरस्कार लौटाने जैसे मुद्दे ही चर्चा के केंद्र में रहे।
जनवादी लेखक संघ के दो दिवसीय आयोजन का उद्घाटन करने पहुंचे केदारनाथ सिंह ने कहा, मैं भी उन साहित्यकारों में शामिल हूं जिन्होंने साहित्य अकादमी सम्मान नहीं लौटाया है।
वहीं राजेश जोशी ने साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने वाले शायर मुनव्वर राना के बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि खड़ाऊं उठाने वाले भरत हो सकते हैं लेकिन तुलसीदास नहीं।
मुनव्वर मोदी का जूता उठाने की बात कहते हैं लेकिन तुलसीदास ने खड़ाऊं नहीं उठाईं। जूते उठाने वाले कवि नहीं होते।
कठिन होगी आगे की लड़ाई
मुझे सम्मान से मोह नहीं है लेकिन प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी से मेरी बात हुई है। आगे लड़ाई और कठिन होनी है। हमने इस हथियार को आगे की लड़ाई के लिए बचा रखा है।
वहीं, राजेश जोशी ने ‘अमर उजाला’ से बातचीत में स्पष्ट किया कि महाश्वेता देवी और केदारनाथ सिंह का इशारा साहित्य अकादमी की स्वायत्तता समाप्त करने की सरकार की कोशिशों की ओर है। साहित्य अकादमी का स्वरूप अभी तक लोकतांत्रिक बचा हुआ है।
सरकार चाहती है कि अकादमी की स्वायत्तता समाप्त कर उसे पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया जाए। संगीत नाटक अकादमी और दूसरी अकादमियों की तरह यहां भी अध्यक्ष नियुक्त करने का अधिकार उसे मिल जाए।
केदारजी ने हथियार बचाने की बात उन्हीं दिनों के लिए कही है। बहुत सारे साहित्यकारों, खासकर बंगाल के कई साहित्यकारों ने ऐसे समय के लिए ही अभी सम्मान नहीं लौटाए हैं। यह एक किस्म की समझदारी है कि लड़ाई को कैसे कदम-दर-कदम जारी रखा जा सके।
विरोध में बोलने वाले कठघरे में खड़े कर दिए जाएंगे
केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी, रवींद्र वर्मा, सदानंद शाही, स्वप्निल श्रीवास्तव सहित कई कवियों ने इस मौके पर अपनी कविताएं सुनाईं। ‘कवि कुंभनदास के प्रति’ कविता में केदारनाथ सिंह ने कहा-‘जानता हूं समाधि से फूटकर, आता नहीं कोई उत्तर, फिर भी कविवर, जाते-जाते पूछ लूं, यह कैसी अनबन है, कविता और सीकरी के बीच, कि सदियां गुजर गईं और दोनों में, आज तक पटी ही नहीं।’
उनकी ‘कपास के फूल’ कविता की पंक्तियां थीं-‘वे देवता को पसंद नहीं, लेकिन आश्चर्य इस पर नहीं, आश्चर्य तो ये है कि कविगण भी, लिखते नहीं कविता कपास के फूल पर, प्रेमीजन भेंट में देते नहीं उसे, कभी एक-दूसरे को, जबकि वह है कि नंगा होने से, बचाता है सब को।’
राजेश जोशी ने श्रोताओं की मांग पर अपनी चर्चित कविता सुनाई -‘जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएंगे, कठघरे में खड़े कर दिए जाएंगे, जो विरोध में बोलेंगे, जो सच सच बोलेंगे मारे जाएंगे, धर्म की ध्वजा उठाने जो नहीं जाएंगे जुलूस में, गोलियां भून डालेंगी उन्हें, काफिर करार दिए जाएंगे, सबसे बड़ा अपराध है इस समय में, निहत्थे और निरपराधी होना, जो अपराधी नही होंगे मारे जाएंगे।’
घुवंश मणि, सर्वेन्द्र विक्रम, अनिल कुमार सिंह, अनिल त्रिपाठी, अनिल मिश्र, संजय मिश्र, विशाल श्रीवास्तव, अनिल कुमार श्रीवास्तव, लक्ष्मीकांत त्रिपाठी, संध्या सिंह, रंजना गुप्त ने भी काव्य पाठ किया। संचालन बृजेश चंद्र एवं धन्यवाद ज्ञापन गिरीशचंद्र श्रीवास्तव ने किया।