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'कानपुर के शोले' के नाम से बन रही है एक और 'शोले'

Thu, 26 Nov 2015 01:35 PM IST
प्रदीप अवस्थी/अमर उजाला, कानपुर
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रूपम चौराहा मंगलवार की रात गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा। कुछ लोग अनायास भागे जा रहे थे। कोई कुछ समझ पाता, तभी सामने से दो गुंडे एक व्यक्ति पर तमंचा ताने उसे खींच कर ले गए। सहमे लोग देखते रहे।
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गुंडे वैन में बैठकर फरार हो गए। यह कोई सच्ची घटना नहीं बल्कि ‘कानपुर के शोले’ फिल्म का क्राइम सीन है। जिसे बुधवार को फिल्मा रहे थे अपने कनपुरिया छोरे।

विशुद्ध कनपुरिया अंदाज में, कानपुर की धरती पर, कानपुर के नवोदित कलाकारों के साथ, यहां की अलग अलग लोकेशन में हिंदी फीचर फिल्म बनाया जाना हिंदी फिल्मों के इतिहास में पहला मौका है।
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पौने दो घंटे की इस फिल्म की 60 फीसदी शूटिंग पूरी हो चुकी है। शेष 40 फीसदी शूटिंग के लिए सेट और स्क्रिप्ट भी तैयार है। दिसंबर तक इसे पूरा करने का लक्ष्य है। 26 जनवरी को कानपुर के अलावा यूपी के अन्य शहरों, एमपी और बिहार के सिनेमा घरों में इसकी लांचिंग की तैयारी है।

अपहरण, तस्करी और नशाखोरी पर फोकस

बांसमंडी निवासी और आलम शॉपिंग सेंटर के मालिक आलम खां फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर हैं। बताते हैं कि फिल्म का निर्माण वह शौकिया कर रहे हैं।

कानपुर में बाल अपराध चरम पर है। सैकड़ों बच्चे शहर से गायब हैं। पता नहीं उनका क्या हुआ। शहर के कई क्षेत्रों में नशाखोरी तस्करी हावी है। यह बात मन में कचोटती है। अब इसी पीड़ा को फिल्म के जरिए सामने लाने की कोशिश कर रहा हूं।

मेरे पास और साथी कलाकारों के पास फिल्म बनाने का कोई अनुभव नहीं है। फिर भी कुछ करने की ठान ली है। करीब 20 लाख रुपये फिल्म का बजट है। बड़े उद्यमियों और फाइनेंसरों से मदद मांगी है। अभी तक का काम संतोषजनक है। फिल्म बेचने के लिए जानकारों की मदद ले रहा हूं।
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नाम मजेदार, डायलॉग जानदार

फिल्म के हर सीन में अपने कानपुर की लोकेशन दर्शाई गई है। हर चौराहे, मंदिर मस्जिद, शॉपिंग मॉल, बाजारों, थानों और अस्पतालों को उनके मूल नाम के साथ पेश किया गया है।

घायल को अस्पताल ले जाने का सीन है तो उसमें हैलट और वहां के वास्तविक डॉक्टरों को फिल्माया गया है। फिल्म का हर शॉट कानपुर के लोगों को खुद के फिल्म में होने का अहसास कराता है।

मारधाड़ या गैंगवार का सीन है तो बताया गया है कि मूलगंज में गोली चल गई। फिल्म में चार मिनट की एक कव्वाली है।

फिल्म में कलाकारों के नाम भी कनपुरिया अंदाज वाले हैं। विलेन का नाम बड़े भइया है तो उसका प्रतिद्वंद्वी इमरान सरिया है। एक कलाकार का नाम साहिर कनपुरिया रखा गया है। अन्य नाम भी बड़े निराले हैं। साथ ही डायलॉग भी ठेठ कंपू वाले। जैसे अमा यार, निकल ले, मारेंगे कम घसीटेंगे ज्यादा।
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