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कौन बदलेगा कानुपर का हाल मुरली या जायसवाल!

Sun, 27 Apr 2014 11:01 AM IST
शैलेष अवस्थी/अमर उजाला, लखनऊ
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कानुपर के श्यामनगर इलाके से बाइक से आ रहे राम किशोर सीओडी क्रॉसिंग पर ठहरे और पसीना पोंछने लगे।
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चुनाव पर चर्चा छेड़ते ही उबल पड़े। बोले- देखिए यह निर्माणाधीन ओवरब्रिज। चार साल पहले बनना शुरू हुआ, एक साल में पूरा होना था, अभी 60 फीसदी भी काम नहीं हो सका।

क्या इसे विकास कहते हैं? आखिर किसलिए देते हैं हम वोट, राम किशोर का यह गुस्सा जायज दिखता है।

गोविंदपुरी ओवरब्रिज का प्रस्ताव 15 साल पहले पास हुआ और बनना शुरू हुआ तीन महीने पहले। खपरामोहाल क्रॉसिंग ओवरब्रिज का प्रस्ताव 12 साल पहले हुआ और दो महीने पहले बनना शुरू हुआ।
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यहां से मुरली मनोहर जोशी, श्रीप्रकाश जायसवाल, सुरेंद्र मोहन, सलीम अहमद और महमूद रहमानी में टक्कर है। देखना होगा कानपुर में बदलाव कौन ला पाता है।

देखते हैं क्या करते हैं मोदी

ओवरब्रिज को लेकर ही नहीं, बंद मिलों को लेकर भी लोग परेशान है। एनटीसी कर्मचारी यूनियन के राजेंद्र त्रिवेदी कहते हैं कि 20 साल से शहर की बंद मिलें मुद्दा नहीं बनतीं।

एक भी चालू नहीं हो सकी, घिसट कर चल रही लाल इमली मिल भी चुनाव बाद बंद हो सकती है।

करीब खड़े दुकानदार राजीव कुमार बोल पड़े-जो सरकार बने बहुमत की बने तो ही अच्छा। हम तो बदलाव के पक्ष में हैं।

सरसैया घाट पर गंगा की ओर इशारा करते हुए बुजुर्ग रामसेवक कहते हैं- क्या ऐसी ही थी गंगा?

देखो किस तरह गंदे नाले की तरह लगती है। इसे प्रदूषण से बचाने के लिए आए करोड़ों रुपये पी गए। अब मोदी कहते हैं कि गंगा ने बुलाया है। देखें क्या करते हैं?

जायसवाल का प्लस प्वॉइंट

इस बार मुरली मनोहर जोशी के उतरने से मुकाबला रोचक हो गया है।

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि मुरली मनोहर और श्रीप्रकाश जायसवाल के बीच टक्कर होगी पर सपा के सुरेंद्र मोहन अग्रवाल और बसपा के सलीम अहमद किसी का भी समीकरण बिगाड़ सकते हैं। कुल मिलाकर लड़ाई चारों के बीच है।

इन सबके बीच आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी महमूद रहमानी की बड़ी भूमिका वोट काटने की हो सकती है। कांग्रेस जोशी को बाहरी बता उन्हें चिढ़ाने के साथ घेर भी रही है।

केंद्रीय मंत्री होने के बाद भी कनपुरियों के बीच अपनी सहज उपलब्धता, भाजपा का बाहरी प्रत्याशी और विकास कार्य को श्रीप्रकाश अपना प्लस प्वॉइंट मानते हैं।

क्या है भाजपा का तर्क

भाजपा का तर्क है कि इस बार बदलाव के साथ नरेंद्र मोदी की बयार बह रही है और फिर मुरली मनोहर जोशी को अपनी पहचान बताने की जरूरत नहीं है, वह कद्दावर नेता हैं।

सपा का मानना है कि सूबे में उसकी सरकार है तो भला भी वही करेगी। बसपा को अपने परंपरागत दलित वोट के साथ भरोसा है कि सलीम मैदान में उतरे हैं तो मुसलमान भी उनके पाले में आएंगे।

अब तीन दिन बचे हैं और इस बीच कांग्रेस राहुल गांधी को भी बुलाकर माइलेज लेने की कोशिश में है। सपा के लिए मुलायम सिंह वोट मांग गए और अब अखिलेश यादव आने वाले हैं।

हां, इस बार शत्रुघ्न सिन्हा को छोड़ भाजपा का कोई बड़ा नेता अभी तक प्रचार के लिए नहीं आया है। नरेंद्र मोदी आए थे पर कानपुर शहर से सटे अकबरपुर संसदीय सीट के लिए प्रचार कर गए थे।

अलग रहा है यहां का वोटिंग पैटर्न

बात सियासी समीकरणों की करें तो कानपुर से लगातार तीन बार से सांसद कांग्रेस के श्रीप्रकाश जायसवाल इस बार अपनी सीट बचाने के लिए जूझ रहे हैं तो भाजपा के कद्दावर नेता मुरली मनोहर जोशी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है।

इन दोनों के बीच सपा के सुरेंद्र मोहन अग्रवाल और बसपा के सलीम अहमद भी पार्टी वोट बैंक के जरिये चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश में जुटे हैं।

स्थानीय मुद्दों पर एंटी इनकम्बैंसी फैक्टर भारी पड़ती दिख रही है। कानपुर शहर की संसदीय सीट पर करीब 20 फीसदी ब्राह्मण मतदाता हैं तो 18 फीसदी मुस्लिम।

दलित 12 फीसदी तो पिछड़ा वर्ग के 14 फीसदी मतदाता हैं। वोटिंग ट्रेंड देखें तो ब्राह्मण बहुल इलाका होने का कभी कोई खास असर नहीं दिखा।

1977 में पिछड़े वर्ग से मनोहर लाल लोकसभा पहुंचे तो 1980 में आरिफ मोहम्मद खान, 1984 में नरेश चंद्र चतुर्वेदी, 1989 में सुभाषिनी अली, 1991 में जगतवीर सिंह द्रोण और 1999 से जायसवाल जीतते आ रहे हैं।
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सूरमाओं के दावे

15 साल के भीतर न जाने कितने विकास कार्य करवाए। कई ट्रेनें भी चलवाईं। -श्रीप्रकाश जायसवाल (कांग्रेस)

सपा ही विकास कर सकती है। यह बात पब्लिक दो साल में समझ गई है। -सुरेंद्र मोहन अग्रवाल (सपा)

चौतरफा विकास और सबको साथ लेकर चलने में हम यकीन रखते हैं। हर वर्ग के लोग साथ हैं। -सलीम अहमद (बसपा)

मैं कानपुर की जनता की अरसे से सेवा कर रहा हूं। पब्लिक के लिए आम आदमी पार्टी बड़ा विकल्प है। -महमूद रहमानी (आप)
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