इससे यह पता चलेगा कि लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी एकजुटता की संभावनाएं किस दिशा में आगे बढ़ेंगी और किसके हिस्से में क्या आएगा। खासतौर से रालोद के लिए तो यह चुनाव काफी अहम है। उसका तो इस चुनाव पर ही आगे की संभावनाओं का पूरा दारोमदार टिका है। शायद यही वजह है कि चौधरी अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी लगातार वहीं डटे हैं।
अन्य कुछ सवाल जो बनेंगे परीक्षा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा या बसपा अथवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्षों में भले ही कोई अभी तक कैराना में प्रचार के लिए न गया हो लेकिन कैराना में जीत होती है तो उसे साझा विपक्ष की ताकत का पैमाना माना जाएगा।
जाहिर है कि कम से कम उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए गैर भाजपाई दलों की सियासी तैयारी में कैराना का नतीजा अहम भूमिका निभाने वाला है।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण में बसपा सुप्रीमो के साथ सोनिया गांधी व राहुल गांधी।
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हालांकि इन सवालों का उत्तर तो आगे पता चलेगा कि कर्नाटक में कुमार स्वामी के शपथग्रहण में दिल खोलकर एक-दूसरे से मिलने का संदेश देने वाले माया, अखिलेश, सोनिया-राहुल तथा अजित सिंह भविष्य के लिहाज से एक-दूसरे के लिए अपने दिल में कितनी जगह रखते हैं। इनके बीच नेतृत्व का सवाल अब कोई बड़ा मुद्दा है या नहीं।
बावजूद इसके कर्नाटक का प्रयोग कम से कम उत्तर प्रदेश में आगे बढ़ने की संभावनाएं काफी हद तक कैराना के नतीजों पर ही टिकी हैं। कैराना का नतीजा ही विपक्षी महागठबंधन की संभावनाओं को दिशा देगा और दलों की हिस्सेदारी तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।