नोएडा के चर्चित पूर्व मुख्य अभियंता यादव सिंह की जांच के लिए न्यायिक आयोग के गठन को अरबों रुपये के घोटाले के आरोपों में फंसे यादव सिंह को बचाने की कवायद के रूप में भी देखा जा रहा है।
यादव सिंह पर लगभग 1000 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप है। वह पिछले साल उस वक्त चर्चा में आया था जब आयकर विभाग ने उसके ठिकानों पर छापा मारकर अरबों की बेहिसाब संपत्ति का खुलासा किया था।
मायावती सरकार के चहेते रहे यादव सिंह की अखिलेश सरकार में भी हनक कम नहीं हुई। सत्तारूढ़ दल के कई बड़े नेताओं और वरिष्ठ नौकरशाहों से उसके करीबी संबंध बताए जाते हैं। सत्ता पर उसकी पकड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आयकर छापे में अकूत संपत्ति का खुलासा होने के बाद कई दिनों तक मामले की एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई।
काफी दबाव पड़ने पर उसे निलंबित किया गया। इस मामले में राज्य सरकार के रवैये पर हाईकोर्ट नाराजगी भी जता चुका है।
यादव सिंह को अपने हिसाब से समीकरण बनाने का महारथी माना जाता है। उसने औद्योगिक विकास प्राधिकरण में वर्ष 1981 में बतौर अवर अभियंता जॉइन किया था। उसने वर्ष 2011 में प्राधिकरण से एक नया पद सृजित कराया, जिसे नाम दिया गया इंजीनियर इन चीफ।
मात्र 10 दिन में बांट दिया 954 करोड़ का काम
नोएडा अथॉरिटी और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी को इसके अधीन कर दिया गया। इसके बाद यादव सिंह के इशारे पर ही दोनों अथॉरिटी के सभी काम दिए गए। दिसंबर 2011 में नोएडा अथॉरिटी के 954 करोड़ रुपये का काम केवल 10 दिन के अंदर ही चहेती कंपनियों को बांटने के बाद वह ज्यादा चर्चा में आया।
बसपा सरकार में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में सभी महत्वपूर्ण कामों पर उसका एकाधिकार था। प्रदेश में सत्ता की बागडोर मार्च 2012 में अखिलेश यादव के हाथों में आने के बाद जून 2012 में यादव सिंह को निलंबित करते हुए रिपोर्ट दर्ज कराई गई। सपा सरकार ने उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी कराया।
पुलिस जांच कर पाती, इससे पहले इसे सीबीसीआईडी के सुपुर्द कर दिया गया। हालांकि यादव सिंह के खिलाफ सपा सरकार की नजर ज्यादा दिनों तक टेढ़ी नहीं रह पाई। सपा के एक शीर्ष नेता के इशारे पर निलंबन के 17 माह बाद ही नवंबर 2013 में उसे बहाल कर पहले नोएडा फिर ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे जैसे तीन महत्वपूर्ण अथॉरिटी का मुख्य अभियंता बना दिया गया।
ये तीनों एनसीआर क्षेत्र की सबसे प्राइम पोस्टिंग मानी जाती हैं। यह बहाली इतनी गुपचुप तरीके से हुई कि तत्कालीन मुख्य सचिव जावेद उस्मानी तक को इसकी भनक नहीं लग सकी थी।
बसपा सरकार में बोलती थी तूती
माया सरकार में नोएडा के सभी इंस्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट यादव सिंह की देखरेख में ही होते थे। भाजपा के वरिष्ठ नेता किरीट सोमैया ने उसकी कई फर्जी कंपनियों का खुलासा करते हुए मायावती के भाई के साथ उसके व्यावसायिक संबंध होने का आरोप भी लगाया था।
इसके बावजूद अखिलेश सरकार ने उसे एनसीआर के तीनों महत्वपूर्ण प्राधिकरणों का जिम्मा दे दिया।
अपने हिसाब से कराता था सीईओ की तैनाती
यादव सिंह की हनक का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी में वह सीईओ की तैनाती अपने हिसाब से कराता था। जिसने भी उसकी नहीं सुनी या अनदेखी करने की कोशिश की, उसे हटवा दिया।