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झांसी मंडल की रिपोर्ट: दुर्ग बचाने के लिए होगा भीषण संग्राम, इस बार भाजपा को कड़ी टक्कर दे रही सपा-बसपा

Tue, 14 Dec 2021 12:30 PM IST
ishwar ashish पुनीत शर्मा, अमर उजाला, लखनऊ

सार

2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने झांसी मंडल में सभी सीटें जीती थी। हालांकि, इस बार भाजपा को सपा, बसपा व कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिल रही है।
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मेडिकल कॉलेज का सुपर स्पेशियलिटी बनकर तैयार है। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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मैं तीर्थस्थली वीरों की

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मैं क्रांतिकारियों की काशी...
मैं हूं झांसी... मैं हूं झांसी... मैं हूं झांसी...।

झांसी में 19 नवंबर को महारानी लक्ष्मीबाई की जयंती पर किले की तलहटी से इन्हीं शब्दों के साथ बुंदेलखंड के विकास की तस्वीर पेश की थी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने। पीएम ने कहा था कि चाहे रानी की धरती हो या फिर आल्हा-ऊदल की वीर भूमि, हमेशा मुझे यहां से प्यार मिला है...। साथ मिला है...। अब यह सब प्रधानमंत्री ने यूं ही नहीं कहा था। बल्कि, बात चाहे झांसी की हो या फिर ललितपुर या जालौन की, आज ये तीनों जिले भगवा गढ़ के रूप में पहचाने जाते हैं।

नौ सीटों वाले इस झांसी मंडल की पहचान कभी गरीबी और सूखे के लिए होती थी, पर अब हालात आहिस्ता-आहिस्ता बदल रहे हैं। फिर भी छुट्टा पशु (अन्ना पशु) और पेयजल आज भी यहां सबसे बड़ी समस्या है। कई इलाके ऐसे हैं, जहां जिंदगी पानी ढोने में ही बीती जा रही है। रोजगार के लिए होते पलायन ने भी गांवों को खाली कर दिया है। हालांकि, डिफेंस कॉरिडोर लाकर रोजगार के द्वार खोलने के दावे हो रहे हैं। चलिए, यहां से हम शुरू करते हैं झांसी मंडल की बदलती सियासी तस्वीर की कहानी।
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बात शुरू करने से पहले आपको उस कालखंड में ले चलते हैं जब मंडल में 10 विधानसभा सीटें हुआ करती थीं। यह कालखंड है 2002 का। उस साल हुए चुनाव में भाजपा ने पांच सीटों पर भगवा परचम फहराया था। वहीं, बाकी पांच सीटों में से बसपा ने तीन और सपा व कांग्रेस ने एक-एक सीट जीती थीं। पर,  2007 आया तो यहां का सियासी मिजाज बदल गया। बसपा के हाथी ने चुनावी रण में सबको पीछे छोड़ सात सीटों पर कब्जा जमा लिया। कांग्रेस को दो और सपा को एक सीट मिली।

भाजपा इससे पहली जीती पांच सीटों पर भी अपनी पकड़ गंवा बैठी। 2012 के चुनाव में परिसीमन के बाद एक सीट कम हो गई जिससे नौ विधानसभा सीटें ही मंडल में रह गईं। इनमें भी बसपा ने सबसे अच्छा प्रदर्शन करते हुए 4 सीटों पर कब्जा जमाया। तीन सीटों पर साइकिल दौड़ी, तो एक-एक सीट कांग्रेस और भाजपा के हिस्से में आईं। वहीं, 2017 में ऐसी बयार बही कि सभी नौ सीटों पर भगवा परचम फहराने लगा।

भाजपा-बसपा का ही रहा मंडल में दबदबा
झांसी मंडल के सियासी गणित को इस तरह समझा जा सकता है कि यहां या तो बसपा हावी रही या फिर भाजपा। कांग्रेस और सपा को यहां दूसरी पार्टियों की तुलना में उतनी मजबूती नहीं मिल पाई। यही वजह है कि इस बार अखिलेश यादव झांसी में पूरी ताकत लगाए हुए हैं। उन्होंने बड़ागांव, चिरगांव और मोंठ की सभाओं में भीड़ जुटाकर भगवा खेमे में बेचैनी पैदा कर दी है। बसपा और कांग्रेस भी अपनी सियासी जमीन को मजबूत करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे। प्रियंका गांधी ललितपुर का दौरा कर चुकी हैं। वहीं, बसपा के सतीश चंद्र मिश्रा ने भी पिछले दिनों झांसी में प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन किया था। झांसी मंडल की सियासी तस्वीर को अगर कम शब्दों में बयां किया जाए तो आप यह मान लीजिए कि सभी नौ सीटों पर इस बार सियासी रण भीषण होने जा रहा है। सभी दल माहौल को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी ताकत से जुटे हैं।

शहर में ही कई जगह पानी के लिए लगती है लाइन

शहर के कई इलाके आज भी ऐसे हैं जहां पानी के लिए लाइनें लगती हैं। हजारों लोगों की सुबह पानी ढोने के साथ होती है। दूर-दराज से पानी लाते पुरुष और महिलाएं आपको दिख ही जाएंगे। यूं तो चुनाव में हर घर तक पानी पहुंचाने का भरोसा देकर वोट मांगे जाते हैं, लेकिन हालात फिर भी सुधर नहीं रहे। कुएं सूख गए हैं। हैंडपंप खराब पड़े हैं। सप्लाई के पानी में भी लो प्रेशर का रोना। जनपद के गरौठा, बबीना, मऊरानीपुर के कई इलाके ऐसे हैं जहां पानी का भीषण संकट रहता है। झांसी महानगर की बात करें तो बड़ागांव गेट बाहर की कई कालोनियां, बिजौली, करगुवां, दरीगरान, प्रेमनगर पुलिया नंबर नौ में पानी के लिए टैंकर का ही सहारा रहता है।

कहने को स्मार्ट सिटी...पर समस्याएं कम नहीं
मुद्दों की बात छिड़ते ही बड़ागांव गेट बाहर निवासी महावीर शरण कहते हैं, कहने को तो शहर अब स्मार्ट सिटी है, पर पानी के संकट से लोग आज भी जूझ रहे हैं। वहीं, अविनाश भार्गव बेबाकी से कहते हैं, आम आदमी और उसकी समस्याओं की याद तो चुनाव में ही आती है। बाद में तो कोई झांकता ही नहीं। हालांकि, कोछाभांवर निवासी रघुवीर कहते हैं, ऐसा नहीं है कि पानी के संकट को दूर करने की दिशा में कदम नहीं उठाए गए हों। पाइपलाइन से पानी पहुंचने लगा है। इससे संकट कम हुआ है। गुमनावारा निवासी रमेश चंद्र भी कहते हैं कि आहिस्ता-आहिस्ता हालात सुधर रहे हैं। पर, शहर के बाहरी इलाकों को ही संवारा जा रहा है।

अंदरूनी इलाकों की आबादी आज भी विकास के लिए तरस रही है। इन इलाकों में संकरी गलियां हैं। साफ-सफाई होती नहीं। रोहताश कुमार भी चर्चा छिड़ते ही सवाल उठाते हैं-कहां हुआ है विकास? आप ही बताइए? ग्वालियर रोड रेलवे क्रॉसिंग पर शहर फंसा रहता है। जब जाओ फाटक बंद। आज तक ओवरब्रिज का निर्माण नहीं करा पाए। सूती मिल बंद पड़ी है। हजारों लोग बेरोजगार हैं। इनके बारे में तो कोई बात ही नहीं होती। छोटे-छोटे शहरों में एयरपोर्ट बन गए। पर, झांसी वालों को हर साल इसका ख्वाब दिखाया जाता है।

अन्ना पशु बर्बाद कर रहे खेती, रातों को जागकर रखवाली कर रहे किसान
बंगरा के महेश प्रसाद और वीरेंद्र कुमार चुनावी चर्चा छिड़ते ही अन्ना पशुओं से हो रही समस्या उठा देते हैं। वे कहते हैं, जब गोशाला में पशुओं को चारा मिलेगा ही नहीं तो वह खेतों की ही तरफ तो जाएंगे। मगरपुर के कमलेश दुबे और लोहारी के मनोज कुमार भी यही सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं, किसान फसलों को हो रहे नुकसान से बर्बाद हुआ जा रहा है, पर कोई सुनने वाला नहीं है। मंडल के जिले झांसी, ललितपुर या जालौन हों या फिर बांदा, महोबा, हमीरपुर और चित्रकूट, किसान अपनी फसलों की रखवाली करने के लिए रात-रातभर जागते हैं। कड़ाके की ठंड में भी किसान जंगल में होता है।

कब बुझेगी प्यास, हर घर जल योजना की रफ्तार भी बेहद सुस्त
ललितपुर, झांसी और महोबा में हर घर तक साफ  पानी पहुंचाने के लिए ‘हर घर नल से जल’ योजना बनाई गई। 2185 करोड़ की इस योजना पर जून 2020 में काम भी शुरू हो गया था। 770 ग्राम पंचायतों में 66 लाख लोगों को लाभान्वित किया जाना है। पर, अभी कई जगह पाइपलाइन तक नहीं बिछ पाई है। हालांकि दावा किया जा रहा है कि अगले साल पूरा कर लिया जाएगा मगर जो रफ्तार है उससे लगता नहीं कि प्रोजेक्ट समय से पूरा हो पाएगा। झांसी के प्रेमपाल कहते हैं, हम तो कई साल से सुनते आ रहे हैं कि पानी का संकट दूर हो जाएगा। पर, हुआ नहीं।

वोटन की दारे घर की दैरी खूंदखात और फिर पांच साल लौं मौ नई दिखात

बबीना विधानसभा क्षेत्र के ढिकौली गांव की रामप्यारी चुनावी चर्चा छिड़ते ही अपनी नाराजगी जताने लगती हैं। वह कहती हैं-‘वोटन की दारे घर की दैरी खूंदखात और फिर पांच साल लौं मौ नई दिखात। अबै तो पाउन पै मूड़ धर-धर कैं मताई मोरी मताई कत और जब जीत जात सो इनके द्वारे ठाड़े सिपाई भीतरे नई घुसन देत। कोऊ जीत जाय, हमई कोऊ नई सुनत, सालन से मीलन दूर से पानी ढौकें प्यास बुझा रए, नेता और हाकिम आउत सो झूठी सांसीं बातें करके चले जात।’ आसान शब्दों में कहें तो वह साफ-साफ कहती हैं कि वोट के लिए नेता तो आते हैं। मिन्नतें करते हैं। पर, उसके बाद कोई नहीं सुनता। हमें तो मीलों दूर से पानी लाकर प्यास बुझानी पड़ती है।

ललितपुर : दल से अधिक जातीय समीकरण रहते हैं हावी
अब बात ललितपुर की। जिले में तीन बड़े प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। प्रदेश सरकार ने चिकित्सा सुविधा बढ़ाने के लिए मेडिकल कॉलेज व बल्क ड्रग पार्क की सौगात दी है। हवाई अड्डे को भी मंजूरी मिल गई है। यहां के सियासी मिजाज की बात करें तो यहां दल से ज्यादा जातीय समीकरण हावी रहते हैं। चुनावी मुद्दों की बात छिड़ते ही जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष ओमप्रकाश घोष रोजगार का सवाल उछाल देते हैं। वहीं, नेहरू महाविद्यालय के प्रवक्ता डॉ. संजीव कुमार शर्मा अपनी बात को अलग तरीके से रखते हैं। वह कहते हैं, कुदरत ने ललितपुर को भरपूर संपदा दी है। पर, ऐसी व्यवस्था नहीं बन पाईं जिससे इसका फायदा यहां के स्थानीय लोगों को मिलता। जिला उद्योग व्यापार प्रतिनिधिमंडल के अध्यक्ष प्रदीप कुमार त्रिपाठी कहते हैं कि विकास के नाम पर धरातल पर कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है। इंटेक चैप्टर के संयोजक संतोष शर्मा कहते हैं, पर्यटन के क्षेत्र में यहां काफी संभावनाएं हैं, परंतु संभावनाओं को आकार नहीं दिया जा सका। 

जालौन में भी रोचक होगा मुकाबला
उरई। जिले में चुनावी चर्चा छिड़ते ही लोग उन समीकरणों का हवाला देना नहीं भूलते जिनसे बसपा ने यहां 2017 के पहले सफलता हासिल की थी। बसपा ने अपने उम्मीदवार भी तय कर दिए हैं। सपा भी तैयारियों में जुटी हुई है। लोगों का मानना है कि यदि इस बार सपा कुछ नए चेहरों को मौका देती है तो मुकाबला रोचक होगा। मुद्दों की बात करें तो अन्ना मवेशियों से फसलों को नुकसान के अलावा अहम सड़कों और हाईवे की खराब स्थिति भी चर्चाओं में रहती है।

क्या रंग दिखाएगी राजा बुंदेला की सक्रियता
ललितपुर के रहने वाले राजा बुंदेला ने एक जमाने में मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बना ली थी। नब्बे के दशक में उन्होंने बुंदेलखंड की ओर रुख किया। बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा से जुड़कर अलग राज्य की मांग उठाई। बाद में वे कांग्रेस में चले गए। कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बुंदेलखंड कांग्रेस भी बनाई। चुनाव मैदान में भी वे उतरे, लेकिन कोई करिश्मा नहीं कर पाए। अब वे भाजपा में हैं। उन्हें बुंदेलखंड विकास बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया है। बुंदेलखंड क्षेत्र में उनकी सक्रियता लगातार रहती है।
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सीटों का गणित: झांसी (4 सीटें)

झांसी : भाजपा के रवि शर्मा यहां से विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : ब्राह्मण करीब 80 हजार, अनुसूचित जातियां 70 हजार, कुशवाहा व मुस्लिम 60-60 हजार, साहू 50 हजार, वैश्य 30 हजार, यादव 20 हजार।

बबीना : भाजपा के राजीव सिंह पारीछा विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : लोधी, यादव व अनुसूचित जातियां करीब 70-70 हजार, ब्राह्मण 30 हजार, कुशवाहा व कुर्मी 20-20 हजार, साहू व मुस्लिम 10-10 हजार।

गरौठा : भाजपा के जवाहर लाल राजपूत विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : लोधी व यादव 60-60 हजार, अनुसूचित जातियां 50 हजार, ब्राह्मण व वैश्य 40-40 हजार, कुर्मी 30 हजार, कुशवाहा 20 हजार, मुस्लिम 15 हजार, साहू 10 हजार।

मऊरानीपुर (सु.) : भाजपा के बिहारी लाल आर्य विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : अनुसूचित जातियां करीब 1.40 लाख, यादव 80 हजार, ब्राह्मण व वैश्य 40-40 हजार, मुस्लिम 30 हजार, कुशवाहा 25 हजार।

ललितपुर (2 सीटें)
ललितपुर :
भाजपा के रामरतन कुशवाह विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : यादव करीब 44 हजार, ब्राह्मण 23 हजार, मुस्लिम 21 हजार, सहरिया (आदिवासी) 19 हजार,  क्षत्रिय व बंशकार 18-18 हजार, जैन 17 हजार।

महरौनी (सु.) : भाजपा के मनोहर लाल पंथ विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : अहिरवार करीब 67 हजार, कुशवाह 54 हजार, यादव 41 हजार, लोधी 35 हजार, ब्राह्मण 27 हजार, कुर्मी 25 हजार, क्षत्रिय 24 हजार, सहरिया 16 हजार, बंशकार व पाल 14-14 हजार।

जालौन (3 सीटें)
कालपी : भाजपा के नरेंद्र सिंह जादौन विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : क्षत्रिय करीब 80 हजार, अनुसूचित जातियां 70 हजार, ब्राह्मण 50 हजार, पाल 45 हजार, वैश्य, यादव व निषाद 25-25 हजार, अनुसूचित जनजाति 30 हजार, अन्य पिछड़ा वर्ग 40 हजार, मुस्लिम 30 हजार, कुशवाह 20 हजार।

माधौगढ़ : भाजपा के मूलचंद्र निरंजन विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : पाल, राठौर, कुर्मी करीब 62 हजार, क्षत्रिय 52 हजार, ब्राह्मण व कुशवाह 45-45 हजार, मुस्लिम 38 हजार, यादव 14 हजार, पांचाल, सविता 15 हजार, कुम्हार 11 हजार।

उरई (सु.) : भाजपा के गौरीशंकर वर्मा विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : अनुसूचित जातियां 70 हजार, ब्राह्मण 65 हजार, मुस्लिम 52 हजार, यादव 50 हजार, वैश्य 35 हजार, कुर्मी 22 हजार, क्षत्रिय 17 हजार।
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