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गरीबों की मिठाई पर महंगाई की मार: कम उत्पादन से बढ़ रहे गुड़ के दाम, चीनी मिलों को जाता है 65 फीसदी गन्ना

Tue, 23 Aug 2022 11:03 AM IST
शाहरुख खान अमित मुद्गल, अमर उजाला, लखनऊ

सार

पूरे प्रदेश में गन्ना पेराई के नए सत्र की तैयारी चल रही है। गन्ना विभाग ने गन्ना सर्वे पूरा कर लिया है। इस साल गन्ने का रकबा छह प्रतिशत बढ़कर लगभग 27,80,000 हेक्टेयर हो गया है। ऐसे में जहां चीनी मिलों में इसकी तैयारी को लेकर उत्साह है तो वहीं गुड़ उद्योग भी तैयारियों में जुट गया है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : iStock
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विस्तार
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‘गुरु गुड़ ही रह गए और चेले शक्कर हो गए’ यह कहावत अब चरितार्थ नहीं हो रही है। कारण, गुड़ का कम होता उत्पादन लगातार इसका दाम बढ़ा रहा है। हालांकि गुड़ इंडस्ट्री को बढ़ाने पर सरकार को जोर है। पर 65 प्रतिशत से ज्यादा गन्ना चीनी मिलों को जाने के कारण शेष ही कोल्हू पर जा रहा है। उधर, नए सत्र में एक बार फिर गुड़ इंडस्ट्री को बढ़ाने की कवायद शुरू हुई है लेकिन इस उद्योग से जुड़े कारोबारी कहते हैं, सही तरीके से प्रयास नहीं हो रहे हैं। 
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पूरे प्रदेश में गन्ना पेराई के नए सत्र की तैयारी चल रही है। गन्ना विभाग ने गन्ना सर्वे पूरा कर लिया है। इस साल गन्ने का रकबा छह प्रतिशत बढ़कर लगभग 27,80,000 हेक्टेयर हो गया है। ऐसे में जहां चीनी मिलों में इसकी तैयारी को लेकर उत्साह है तो वहीं गुड़ उद्योग भी तैयारियों में जुट गया है। 

यूपी में लगभग पांच हजार कोल्हुओं का संचालन हो रहा है। नए सत्र में यह संख्या बढ़ सकती है। अक्तूबर से चीनी मिलें और सितंबर से कोल्हू के पूर्ण क्षमता के साथ शुरू होने की तैयारियां हैं।
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वर्तमान में गुड़ फुटकर में 50 से 60 रुपये प्रति किलो मिल रहा है जबकि चीनी 40 से 42 रुपये प्रति किलो मिल रही है। वह भी तब जब चीनी के दाम पहले से बेहतर हैं। गुड़ का थोक रेट 3,400 रुपये प्रति क्विंटल से पार जा रहा है जबकि चीनी का थोक रेट भी लगभग इतना ही है।
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सालाना 45 से 50 लाख टन गुड़ को हो रहा उत्पादन

प्रदेश में 45 से 50 लाख टन गुड़ का उत्पादन हो रहा है। वर्ष 1990 के आसपास की बात करें तो उत्पादन ज्यादा था। उस समय चीनी मिलों की संख्या कम थी। लगभग 60 प्रतिशत से ज्यादा गन्ना कोल्हू या क्रेशर लेते थे पर आज इसका उलट है। ज्यादा गन्ना अब चीनी मिलें ले रही हैं। क्रशर में भी रसकट गुड़ आदि बनता था, जो बड़ा उद्योग था। बाद में क्रशर भी बंद होते चले गए। इसका एक बड़ा कारण गन्ना मूल्य भी है। चीनी मिलों पर गन्ना डालने से रेट ज्यादा मिलता जबकि कोल्हुओं पर कम। मजबूरी में ही किसान कोल्हू का रुख करते हैं।

प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष खपत 6 से 3 किलो पर आया 
फेडरेशन ऑफ गुड़ ट्रेडर्स के अध्यक्ष अरुण खंडेलवाल कहते हैं कि पहले प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष छह किलो गुड़ की खपत होती है। अब घटकर यह तीन किलो से कम हो गई है। दरअसल गुड़ एक औषधि है और यह समझने वाले लोग इसका ज्यादा प्रयोग कर रहे हैं। कोरोना काल में भी इसका प्रयोग बढ़ा पर सरकार को इसके लिए ठोस नीति बनानी होगी। जो नई खांडसारी नीति बनाई गई थी, वह अव्यवहारिक थी। इसलिए क्रेशर उतने नहीं बढ़े, जितने बढ़ने चाहिए थे। हालांकि खंडेलवाल यह भी मानते हैं कि गुड़ की गुणवत्ता में फर्क आया है। उत्पादकों ने इसके साथ इंसाफ नहीं किया। 

सरकार खांडसारी नीति को प्रोत्साहन दे रही है। कोल्हू संचालक इस समय फायदे में हैं क्योंकि गुड़ महंगा है। यह किसानों के लिए भी अच्छी बात होगी। हम जल्दी ही लखनऊ में गुड़ मेला लगाने जा रहे हैं जिससे कि इस उद्योग का प्रोत्साहन हो सके। 
- लक्ष्मी नारायण चौधरी, गन्ना मंत्री
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