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नखलऊवा पंचः जेल में नाटक में ही मिल गई थी बिस्मिल को मौत की सजा

Tue, 26 Mar 2019 01:59 AM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला लखनऊ
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राम प्रसाद बिस्मिल - फोटो : amarujala
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काकोरी केस में शामिल क्रांतिकारी गजब जीवट के थे। जज ने काकोरी केस की सुनवाई पूरी कर ली थी। फैसला सुनाने के लिए 15 दिन का समय लिया था। पर, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला, ठाकुर रोशन सिंह सहित ये सभी क्रांतिकारी न जाने किस मिट्टी के बने हुए थे।
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सभी को पता था कि उन्हें फांसी की सजा भी हो सकती है। पर, वे सब  इससे बेफिक्रऔर मस्त थे। आखिरकार फैसले की घड़ी आ ही पहुंची। बात 5 अप्रैल 1927 की है। लखनऊ जेल  में बंद रामप्रसाद बिस्मिल सहित अन्य क्रांतिकारियों के भाग्य का अगले दिन अदालत में  फैसला होना था।

सुधीर विद्यार्थी ने एक संस्मरण में लिखा है, क्रांतिकारियों ने 5 अप्रैल की रात भोजन के बाद 11 नंबर की बैरक में एक दिलचस्प नाटक खेला। भोजन के बाद इन क्रांतिकारियों ने बैरक में अदालत लगाई। अपने बीच से एक जज बनाया और नाटक शुरू किया। वकील बने क्रांतिकारियों के बीच बहस हुई। फिर जज से फैसला सुनाने को कहा गया।
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जेलर और सिपाही भी देख रहे थे नाटक

राम प्रसाद बिस्मिल - फोटो : डेमो
जज बने क्रांतिकारी ने फैसला सुनाया, रामप्रसाद बिस्मिल सहित अन्य क्रांतिकारी भारत को  दयालु ब्रिटिश साम्राज्य से छीनना चाहते हैं।  इन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ षड्यंत्र किया है। चूंकि बिस्मिल क्रांतिकारियों के अगुवा हैं, इसलिए इन्हें प्राणदंड की सजा दी जाती है।

बिस्मिल ने फैसला सुना और भारत मां की जय का नारा लगाया । बैरक में चल रहे नाटक को जंगले के बाहर खड़े होकर जेलर और सिपाही भी देख रहे थे। वे भी अपने आंसू नहीं रोक पा रहे थे।
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