काकोरी केस में शामिल क्रांतिकारी गजब जीवट के थे। जज ने काकोरी केस की सुनवाई पूरी कर ली थी। फैसला सुनाने के लिए 15 दिन का समय लिया था। पर, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला, ठाकुर रोशन सिंह सहित ये सभी क्रांतिकारी न जाने किस मिट्टी के बने हुए थे।
सभी को पता था कि उन्हें फांसी की सजा भी हो सकती है। पर, वे सब इससे बेफिक्रऔर मस्त थे। आखिरकार फैसले की घड़ी आ ही पहुंची। बात 5 अप्रैल 1927 की है। लखनऊ जेल में बंद रामप्रसाद बिस्मिल सहित अन्य क्रांतिकारियों के भाग्य का अगले दिन अदालत में फैसला होना था।
सुधीर विद्यार्थी ने एक संस्मरण में लिखा है, क्रांतिकारियों ने 5 अप्रैल की रात भोजन के बाद 11 नंबर की बैरक में एक दिलचस्प नाटक खेला। भोजन के बाद इन क्रांतिकारियों ने बैरक में अदालत लगाई। अपने बीच से एक जज बनाया और नाटक शुरू किया। वकील बने क्रांतिकारियों के बीच बहस हुई। फिर जज से फैसला सुनाने को कहा गया।