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Lucknow News: समय पर पहचान से पल्मोनरी हाइपरटेंशन को काबू करना संभव

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लखनऊ। पल्मोनरी हाईपरटेंशन के कारण और प्रकार अलग-अलग होते हैं। इसलिए हर मरीज का इलाज एक जैसा नहीं हो सकता। बीमारी के प्रकार और गंभीरता के आधार पर उपचार तय करना जरूरी है। आधुनिक उपचार से पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन के मरीजों में लंबे समय तक बेहतर जीवन की उम्मीद बढ़ी है। बीमारी का देर से पता चलने पर कुछ गंभीर मामलों में हार्ट ट्रांसप्लांट अंतिम विकल्प रह जाता है। यह जानकारी केजीएमयू के पल्मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ. वेद प्रकाश ने शनिवार को शताब्दी भवन प्रेक्षागृह में आयोजित पल्मोनरी हाईपरटेंशन समिट में दी।
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उन्होंने बताया कि थोड़ी दूर चलने पर थकान या सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलना सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ये पल्मोनरी हाइपरटेंशन के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। इसमें फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में दबाव बढ़ने से हृदय के दाहिने हिस्से को रक्त पंप करने में अधिक मेहनत करनी पड़ती है। सांस फूलना, थकान, सीने में दर्द, चक्कर या बेहोशी और पैरों में सूजन इसके प्रमुख लक्षण हैं।
समय पर पहचान जरूरी
डॉ. वेद प्रकाश ने कहा कि क्रॉनिक थ्रोम्बोएम्बोलिक पल्मोनरी हाइपरटेंशन में समय पर बीमारी की पहचान बेहद जरूरी है। कुछ मरीजों में सर्जरी से इसका स्थायी इलाज संभव है। देर से पहचान होने पर तीन साल तक जीवित रहने की संभावना करीब 55 प्रतिशत रह जाती है। राइट-हार्ट कैथीटेराइजेशन से बीमारी की पुष्टि और रक्त वाहिकाओं में दबाव की गंभीरता का आकलन किया जाता है।
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विशेषज्ञों ने बताए उपचार के तरीके
बंगलूरू स्थित नारायणा हेल्थ के डॉ. बाशा जे. खान ने कहा कि बीमारी का सही वर्गीकरण उपचार तय करने की पहली सीढ़ी है। डॉ. प्रशांत बोभाटे ने राइट-हार्ट कैथीटेराइजेशन को बीमारी की पुष्टि और हेमोडायनामिक गंभीरता के आकलन की विश्वसनीय जांच बताया। विशेषज्ञों ने इंटरस्टिशियल लंग डिजीज, कनेक्टिव टिश्यू डिजीज और लेफ्ट हार्ट डिजीज से जुड़े मरीजों में भी समय पर पीएच की पहचान पर जोर दिया।
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