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ओमपुरी ने कहा कुत्ते को कुत्ता नहीं कुत्ता जी बोलिए!

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'हो गया दिमाग का दही' के प्रचार को ‘अमर उजाला’ कार्यालय पहुंचे प्रसिद्ध अभिनेता ओमपुरी पहले ही स्पष्ट कर देते हैं कि इस फिल्म में न शाहरुख खान हैं, न सलमान खान, न आमिर खान हैं।
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लेकिन मैं भरोसा दिला सकता हूं कि यह साफ-सुथरी फिल्म है, कामेडी फिल्म है, द्विअर्थी नहीं है और न ही इसमें आइटम नम्बर है। आप इसे परिवार के साथ देख सकते हैं।

फिल्म में मेरे किरदार का नाम है मिर्जा किशन सिंह जोसेफ, इस प्रकार इस किरदार में चारो धर्मों का मिश्रण आ गया। फिल्म में मेरे अलावा कादर खान, राजपाल यादव, संजय मिश्र हैं लेकिन इस फिल्म में कोई गंभीर सन्देश नहीं है। यह मालामाल वीकली, चाची 420, हेराफेरी जैसे मिजाज की फिल्म है।
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ओमपुरी कहते हैं कि दो तरह के सिनेमा की जरूरत होती है हमारी जनता को। एक वह सिनेमा जो हमें तनाव देता है। यह उन समस्याओं को लेकर बनता है जिनसे हम जूझ रहे होते हैं लेकिन यह सिनेमा उन समस्याओं की बहुत गंभीरता से शोध और अध्ययन कर बनती हैं।

ये फिल्में हमें उन समस्याओं को समझने में मदद करती हैं। ये बताती हैं कि इसकी जड़ें ये हैं और हमारे हिसाब से इनका निवारण इस तरह हो सकता है। आप इसमें यह योगदान दे सकते हैं और सरकार से इस योगदान की अपेक्षा है। जब समस्याएं समझ में आ जाता है तो दिमाग का बोझ थोड़ा कम होता है।

ओमपुरी कहते हैं कि दूसरा जो सिनेमा हमें चाहिए वह जिस्म की मालिश केलिए। वह है मनोरंजन का सिनेमा। योगा में कहा गया है कि आपकेलिए हंसना बहुत जरूरी है। यह एक टॉनिक की तरह है। या तो आप स्वाभाविक तरीके से हंसिए या फिर अस्वाभाविक तरीके से।

हंसने से आपके दिमाग में वजन कम होता है, शिराएं खुलती हैं और खून का प्रवाह भी बेहतर होता है। फिल्म में मेरा किरदार बहुत सख्त मिजाज का है। उसकी एक हवेली है और इस हवेली पर उसे नाज है।

इस हवेली की ओर कोई आंख उठाकर नहीं देख सकता। तीन लड़के आते हैं और कहते हैं कि यह हवेली तो हमारी है। मिर्जा पूछता है कि कैसे तो वे पांच छह कागज दिखाते हैं। मिर्जा बोलता है बस, 30 ग्राम पेपर लेकर आए हो।
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कुत्ता नहीं, कुत्ता जी बोलिए

ओमपुरी बताते हैं कि फिल्म में मेरा जो किरदार है उसके पास कुत्ता है जिसका नाम है गब्बर। लेकिन थोड़ा ठहरिए। कुत्ता को कुत्ता नहीं, कुत्ता जी कहिए। सेंसर ने कुछ ऐसे नियम निकाले हैं कि आप कुत्ता नहीं कह सकते।

तो मैंने तय किया है कि या तो मैं उसे मिस्टर कुत्ता कहूंगा या फिर कुत्ता जी कहूंगा और केवल कुत्ता को ही नहीं, मिस चिड़िया, मिस्टर शेर, मिस्टर भालू कहूंगा। इससे मेनका जी भी खुश हो जाएंगी और सेंसर को भी बुरा नहीं लगेगा।

पुरी साहब कहते हैं कि मेरा जो किरदार है वह शेरो-शायरी का भी बहुत शौकीन है। वह अपने दोस्तों के बीच शेरो-शायरी सुनाता है और शायरी की ऐसी-तैसी भी करता है। पहली पंक्ति किसी विख्यात शायर का होता है और दूसरी पंक्ति खुद अपना बनाता है।

अब जैसे गालिब के शेर को कुछ इस प्रकार कहता है- ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, मेले से लौटकर गिने तो कमबख्त दो बच्चे कम निकले’।

दूसरा शेर कुछ यूं है- ‘किसकी मजाल कि छू ले दिलेर को, मोहब्बत में तो काट लेते हैं कुत्ते भी शेर को’। इसी प्रकार ‘जो बात जेहन में आए उसको वहीं पे लिख लो, चाय की प्याली में डुबकी लगाओ और पार्लियामेण्ट में निकलो’ या फिर ‘मेरे जनाजे को यहीं पे रोक लो, मुझमें जान आ रही है थोड़ा आगे जा के बाएं मोड़ लो, शराब की दुकान आ रही है..’।

ओमपुरी कहते हैं कि ‘अर्द्धसत्य‘, ‘आक्रोश‘ जैसी हार्ड हिटिंग फिल्में आज नहीं बन रही हैं। ‘आक्रोश’ हमारी राजनीति पर बहुत बड़ा वार था, ‘अर्द्धसत्य’ भी पुलिस तंत्र को लेकर था और उसमें दिखाया गया था कि किस प्रकार राजनीति की दखल पुलिस तंत्र में होती है। राजनेताओं को इस तरह की फिल्में जरूर देखनी चाहिए जिससे उनको पता चले कि वास्तविक सच्चाई क्या है।

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