पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के शासन में पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिए गए थे कि अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (एससी-एसटी एक्ट) में निर्दोषों का उत्पीड़न न किया जाए। केवल शिकायत के आधार पर पुलिस कार्रवाई न करे। इसके लिए मुख्य सचिव ने दिशा-निर्देश जारी किए थे।
मायावती के कार्यकाल में मुख्य सचिव प्रशांत कुमार ने 29 अक्तूबर 2007 को सभी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों व पुलिस अधीक्षकों को सर्कुलर भेजकर निर्देश दिए थे कि हत्या-बलात्कार जैसे अपराधों में वे अपनी देखरेख में विवेचना करवाएं।
त्वरित न्याय दिलाने के साथ यह भी ध्यान रखा जाए कि किसी निर्दोष व्यक्ति को परेशान न किया जाए। विवेचना में यदि मामला झूठा पाया जाता है तो धारा 182 के तहत केस दर्ज करवाने वाले के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
प्रशांत कुमार से पहले मुख्य सचिव रहे शंभूनाथ ने भी 20 मई 2007 को जारी आदेश में कहा था कि एससी-एसटी एक्ट में सिर्फ शिकायत के आधार पर पुलिस कार्रवाई न करे। प्रारंभिक जांच में अगर पहली नजर में आरोपी दोषी लगता है तभी उसे गिरफ्तार करें।
शंभूनाथ ने यह आदेश मायावती के मुख्यमंत्री बनने के एक हफ्ते बाद ही जारी किए थे। इसमें कहा गया था कि अगर रेप जैसे मामले में एस-एसटी एक्ट लगाया जाता है तो पीड़िता के मेडिकल परीक्षण के बाद आरोप सही पाए जाने पर ही कार्रवाई की जाए। पुलिस को सिर्फ इस आधार पर एससी-एसटी एक्ट की धाराओं में कार्रवाई नहीं करनी चाहिए कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति, जनजाति से है।
मायावती ने आशंका जताई थी कि लोग दुश्मनी का बदला लेने के लिए भी इस एक्ट का इस्तेमाल कर सकते हैं। बसपा शासन में यह भी निर्देश दिए गए थे कि पुलिस महानिदेशक प्रत्येक माह विभिन्न जिलों से एससी-एसटी एक्ट के मामलों की सूची मंगवाकर शासन को उससे अवगत कराएंगे।