बीते लोकसभा चुनाव में प्रदेश में अवैध शस्त्र बनाने की 240 फैक्टरियां पकड़ी गई थीं। चुनाव के दौरान 10 हजार 575 अवैध असलहे भी जब्त किए गए थे। जाहिर है इन असलहों के लिए कारतूस की भी जरूरत होती है, जिसका निर्माण करना संभव नहीं है।
यह कारतूस कालाबाजारी से ही हासिल किया जा सकता है। अवैध कारतूस हासिल करने के लिए यूपी एक बड़ा बाजार है जहां लाखों की संख्या में असलहों के लाइसेंस जारी किए गए हैं, लेकिन असलहों के साथ कारतूस का ऑडिट शायद ही कभी होता हो।
यूपी में स्टेटस सिंबल बना शस्त्र लाइसेंस, राजधानी में हर 85वें व्यक्ति के पास
गृह विभाग के आंकड़ों की मानें तो प्रदेश में असलहा और इसका लाइसेंस रखना स्टेटस सिंबल माना जाता है। यहां 12.78 लाख लोगों के पास असलहे का लाइसेंस है। राजधानी लखनऊ की आबादी लगभग 45 लाख है और यहां सबसे अधिक 53,033 लोगों के पास असलहों के लाइसेंस हैं। यानी हर 85वें व्यक्ति के पास असलहे का लाइसेंस है।
दूसरे नंबर पर जम्मू-कश्मीर है। वहां आतंकवाद की वजह से असलहों के लाइसेंस आसानी से हासिल हो जाते हैं। बावजूद इसके वहां असलहा लाइसेंसधारियों की संख्या 3.69 लाख है। पंजाब में भी आंतरिक आतंकवाद को लेकर सबसे अधिक असलहों के लाइसेंस दिए जाते रहे। वहां 3.59 लाख लोगों के पास असलहों का लाइसेंस है।
नए नियमों के मुताबिक यूपी में एक असलहाधारी एक साल में अधिकतम 200 कारतूस खरीद सकता है। साथ ही एक साथ 100 कारतूस रख सकता है। पहले यह संख्या काफी कम थी। नया कारतूस हासिल करने के लिए इस्तेमाल किए गए 80 प्रतिशत कारतूस का खोखा जमा करना होता है।
कारतूस पर नंबरिंग हो तो रुके कालाबाजारी
पुलिस महकमे में असलहों और कारतूसों की देख-रेख करने वाली लॉजिस्टिक विंग के एक अधिकारी की मानें तो कारतूसों की कालाबाजारी रोकने के लिए पहले एक प्रस्ताव शासन को भेजा गया था।
इसमें कारतूस पर नंबरिंग का प्रावधान करने की बात कही गई थी, लेकिन शासन स्तर पर इस पर अमल नहीं हो सका। अगर यह प्रावधान लागू कर दिया जाए तो हत्या की घटनाओं में काफी कमी आएगी। साथ ही हत्या में इस्तेमाल कारतूस के खोखे से यह पता लगाना आसान होगा कि यह किस असलहाधारी को दिया गया था।
लखनऊ 53033
आगरा 47102
बरेली 45896
प्रयागराज 45841
कानपुर नगर 39095
इन पांच राज्यों में यूपी के प्रमुख जिलों से कम लाइसेंसधारी
दिल्ली 38754
तमिलनाडु 22532
असम 19283
ओडिशा 20588
केरल 9459