यूपी चुनाव में अलग-अलग जगहों पर स्थानीय मुद्दों के सहारे लोगों की भावनाओं को कुरेदकर समीकरण दुरुस्त करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को मिर्जापुर में भी यही किया।
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मिर्जापुर सहित पूर्वांचल के हर मुद्दे पर बात की तो इस इलाके की परेशानियों के बहाने स्थानीय लोगों की दुखती रग पर भी हाथ रखा। उन्हें शायद यह बखूबी ध्यान था कि मिर्जापुर की सीमा इलाहाबाद से लगती है, जहां स्थित राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा पीसीएस से लेकर अन्य कई भर्तियों में भ्रष्टाचार और पक्षपात पूर्वांचल के युवाओं के बीच बड़ा मुद्दा रहा है। इसको लेकर युवाओं ने लंबे समय तक आंदोलन भी किया था।
संभवत: इसीलिए उन्होंने नजराना, शुकराना, हकराना और जबराना जैसे शब्दों के सहारे प्रदेश में सपा और बसपा सरकारों में पनपे भ्रष्टाचार, युवकों की बेरोजगारी और पूर्वांचल, उसमें भी खास तौर से मिर्जापुर के आसपास की बदहाली पर फोकस किया। साथ ही इस स्थिति के लिए सपा और बसपा की सरकारों की नीतियों को कठघरे में खड़ा किया।
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मुलायम का सहारा लेकर अखिलेश पर साधा निशाना
मुलायम सिंह यादव
प्रहार करने में माहिर मोदी ने सपा की पारिवारिक कलह के बहाने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की।
कहा कि जो पुत्र बरेली से मिर्जापुर को सीधे जोड़ने वाले पुल के निर्माण के पिता के 13 साल पुराने वादे को अपने पांच साल के शासन में पूरा नहीं कर पाए तो वह जनता से किए वादों को कैसे याद रखेंगे।
उन्होंने तंज भी किया, ‘पता नहीं पुल बना रहे थे या ताजमहल।’ फिर लोगों के सामने यह सवाल उछालकर कि यही पुल अगर सैफई के आसपास होता तो भी क्या 13 साल तक इंतजार करना पड़ता, उन्होंने एक तरह से पूर्वांचल के लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि सपा को वोट देने से उनका या उनके इलाके का कोई फायदा नहीं होने वाला।
मायावती को भी नहीं बख्शा, पत्थरों के सहारे साधा निशाना
बसपा सुप्रीमो मायावती
- फोटो : amar ujala
राहुल गांधी व कांग्रेस तो मोदी के निशाने पर रहे ही, बची बसपा भी नहीं। इसके लिए उन्होंने मिर्जापुर के पत्थरों को मुद्दा बनाया और इस बहाने स्थानीय लोगों की दुखती रग पर यह कहते हुए हाथ रखा कि जिन बहनजी को यह बताने में शर्म आती है कि उन्होंने अपनी मूर्ति मिर्जापुर के पत्थरों से बनवाई है।
जिन्हें मिर्जापुर के पत्थरों से नफरत है, उन्हें मिर्जापुर वालों का वोट लेने का भी कोई हक नहीं है।
एक तरह से मोदी ने मिर्जापुर वालों की भावनात्मक रग पर हाथ रखकर उन्हें भाजपा के साथ जोड़ने की कोशिश की। शायद इसीलिए उन्होंने पुल निर्माण न होने के लिए बसपा को भी नहीं बख्शा।
कहा, ‘मामला अगर इस पुल निर्माण का नहीं बल्कि बहनजी की अपनी मूर्तियां बनवाने का होता तो 13 साल तो दूर, वह तीन महीने भी इंतजार न करतीं। पर, मामला जनता का था तो उन्होंने भी ध्यान नहीं दिया।’
इस बहाने भी साधे निशाने
- फोटो : अमर उजाला
मऊ व महराजगंज की तरह मिर्जापुर में भी गरीबी और गरीबों की बदहाली पर तो मोदी की निगाह रही ही। इस इलाके के गरीबों व गरीबी से अपने जुड़ाव और दूसरों की दूरी बताने के लिए ही शायद उन्होंने यह भी बताना याद रखा कि गरीबी समझने के लिए उन्हें किताबें नहीं पढ़नी पड़ीं। कैमरे के साथ किसी झोपड़ी की यात्रा नहीं करनी पड़ी।
मोदी यहीं नहीं रुके, बल्कि उन्होंने यहां के बर्तन उद्योग की दुर्दशा के लिए सपा व बसपा सरकारों की नीतियों को कठघरे में खड़ा किया। मिर्जापुर और आसपास के इलाकों में मौजूद पर्यटन की संभावनाओं की सरकारों की तरफ से हुई अनदेखी पर प्रहार किया।
विंध्याचल के आध्यात्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए यह समझाने की कोशिश की कि सरकारों में इच्छाशक्ति होती तो यह इलाका बड़े पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो जाता। गरीब नौजवानों को रोजी-रोटी के लिए गुजरात व महाराष्ट्र न जाना पड़ता। अपने बूढ़े मां-बाप और परिवार को छोड़कर पलायन न करना पड़ता।
मोदी ने बुनकरों की समस्याओं को भी उठाया और बताया कि वह उनके लिए बाजार तैयार करने में जुटे हैं। उन्होंने किसानों की भी बात की।
कहा, यूपी के किसानों को सरकारी खरीद की दुश्वारियों से मुक्ति दिलाने के लिए ऐसा मोबाइल एप तैयार कराया है, जिसके सहारे यहां के किसान देश की किसी भी मंडी में अपनी उपज बेच सकते हैं।