लखनऊ
और उसके बाशिंदे पूरी दुनिया में अपनी दरियादिली के लिए मशहूर हैं। यहां
के लोगों के एक से बढ़कर एक मशहूर किस्से हैं। इनमें क्लाउड मार्टिन भी
शुमार हैं, जो पैदा तो फ्रांस में हुए, लेकिन सेना में नौकरी करते हुए
हिंदुस्तान आ गए और लखनऊ में बस गए।
आसिफुद्दौला से दोस्ती करके गाहे-बगाहे
उनकी खूब मदद की। लखनऊ ने एक गरीब सैनिक से तरक्की करके उन्हें एक कामयाब
आर्किटेक्ट और व्यापारी बनते देखा।
एक तालीमी इदारा खोलने के लिए अपनी रिहाइश दे दी। यहीं खुला ला-मार्टीनियर
कॉलेज, जिसमें पढ़ना फख्र की बात मानी जाती है।
इतिहासकार
रवि भट्ट के मुताबिक 4/5 जनवरी 1735 को फ्रांस के लियांस में जन्मे क्लाउड
मार्टिन की जिंदगी की दास्तां किसी फिल्मी कहानी से कम रोचक नहीं है।
17
बरस की उम्र में वे फ्रांसीसी सेना में भर्ती होकर हिंदुस्तान आ गए।
पांडिचेरी में जब अंग्रेजों के खिलाफ फ्रांस की सेना कमजोर पड़ने लगी तो वे
पाला बदल कर अंग्रेजी सेना में शामिल हो गए।
उस वक्त यह सेना सर आई रे
कूटी के अधीन थी। दरअसल मार्टिन बेहद महत्वाकांक्षी और प्रतिभाशाली थे।
सैनिक होते हुए भी उनमें वास्तुविद, आविष्कारक, किसान, खेतिहर, आर्थिक
सलाहकार व सफल व्यापारी के गुण मौजूद थे। 1775 में जब आसिफुद्दौला फैजाबाद
से राजधानी बदल कर लखनऊ पहुंचे तो उसके बाद मार्टिन भी यहां आ गए।
वे
खूबसूरत भवन बनवा कर बेचने का भी काम करते थे और इसमें उन्होंने खूब मुनाफा
कमाया था। उनकी संपन्नता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है न केवल
अंग्रेज बल्कि आसिफुद्दौला भी वक्त जरूरत उनसे कर्ज ले लिया करते थे।
और जब पढ़ी गई वसीयत
वे अपनी कमाई का एक बड़ा
हिस्सा समाज की भलाई के लिए इस्तेमाल करते थे। 13 सितंबर 1800 को उन्होंने
देह त्याग दी। लखनऊ में उनकी मौत के बाद जब उनकी वसीयत पढ़ी गई तो उसमें
लिखा था कि जायदाद बेचकर जो पैसा मिले उससे लखनऊ, कलकत्ता व उनके जन्म
स्थान लियांस में एक-एक स्कूल खोला जाए।
थीं सात सहचरी
उन्होंने अपने सारे गुलामों को भी
आजाद कर दिया था। वैसे तो वे अविवाहित थे पर उनके साथ सात सहचरी रहती थीं।
इनमें से सबसे बड़ी बायोलेन लिसी उनसे उम्र में 30 साल छोटी थी। 65 वर्ष की
आयु में जब मार्टिन ने देह त्यागी तो सबसे छोटी सैली नाम की एक एंग्लो
इंडियन की उम्र महज 14 वर्ष थी।
उनकी अन्य सहचरी मारिया, करीमन, पिन्ना और
दो सगी बहनें गोमानी और अनीमन थीं। इनमें से बायोलेन लिसी से उन्हें सबसे
ज्यादा स्नेह था, जिसे उन्होंने एम कैरियर नाम के एक फ्रेंच से खरीदा था।
1766 में पैदा हुई बायोलेन के पिता नवाब फजल खान मुगल बादशाह औरंगजेब के
वजीर के पोते थे।
अपने लिए कराया था निर्माण
मार्टिन की मौत के बाद उसकी वसीयत के मुताबिक बायोलेन और
सैली को दस-दस हजार रुपये के साथ ही मकान और दूसरों को पांच-पांच हजार
रुपये मिले।
इतिहासकार रोशन तकी के मुताबिक
ला-मार्टीनियर कॉलेज देश के प्राचीनतम शिक्षण संस्थानों में शुमार है।
दरअसल, इसका निर्माण क्लाउड मार्टिन ने खुद अपने रहने के लिए कराया था।
इसमें तुर्की और परशियन कारीगरी का बेजोड़ नमूना नुमाया होता है।
मरने के बाद क्लाउड
मार्टिन यहीं तहखाने में दफना दिए गए। उनका मकबरा यहां आज भी मौजूद है।
कई फिल्मों की हो चुकी है शूटिंग
ला-मार्टीनियर की खूबसूरत
इमारत का बॉलीवुड भी दीवाना है। इस कैंपस में अब तक शतरंज के खिलाड़ी, गदर एक प्रेमकथा, अनवर, ऑल्वेज कभी-कभी सहित कई हिट फिल्मों कीशूटिंग हो चुकी है। हालांकि बच्चों की पढ़ाई के चलते यहां शूटिंग में काफी दुश्वारियां
होती हैं फिर भी इमारत की भव्यता और खूबसूरती पर फिदा निर्माता-निदेशक इसे
बर्दाश्त करने को तैयार रहते हैं।