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आज भी इन तालाबों में इतिहास की नमी मौजूद है

Sun, 08 Sep 2013 10:26 AM IST
टीम डिजिटल/लखनऊ
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लखनऊ में तालाबों का भी अपना इतिहास रहा है। हालांकि ज्यादातर तालाब अपना अस्तित्व खो चुके हैं लेकिन जो तालाब कमोबेस मौजूद हैं उनमें नवाबी दौर की वही ठसक और रौनक देखने को मिलती है।
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राजा टिकैटतराय का तालाब
इस आलीशान तालाब को बनवाने वाले राजा टिकैतराय नवाब असाफुद्दौला के दीवान थे। चारों तरफ से आसफी लखौड़ियों की गहरी सीढ़ियों से बंधा हुआ है ये पक्का वर्गाकार तालाब बड़ा ही भव्य नजारा पेश करता है।

यहां एक तरफ महिलाओं के नहाने के लिए पर्देदार घाट बना हुआ है। इसी तालाब के किनारे लखनऊ में होने वाला शीतला अष्टमी का मशहूर मेला लगता है जिसे 'आठों का मेला' कहते हैं।
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ऐसा कहा जाता है कि नवाबी दौर में इस मेले में शामिल होने के लिए राजा पालकियों और रथों से आते थे, जिसकी रौनक देखते बनती थी।

शीशमहल का तालाब
दौलतखाना इलाके में स्थित इस तालाब का नवाब आसफुद्दौला के 'शीशमहल' को गर्मियों में ठंडा रखने के लिए बनवाया गया था। इस तालाब के साथ की दीवारों में चरागखाने बने हुए है, जिनमें रात को रोशनी और सजावट की जाती थी। यह तालाब लगभग 200 साल पुराना है और अपने स्वच्छ मीठे पानी के लिए मशहूर है। यह आज भी मौजूद है।

सरई गुदौली का तालाब
लखनऊ से लगभग 30 कि.मी. दूर गोसाईगंज से आगे मोहनलालगंज रोड पर शारदा सहायक परियोजना के निकट एक विशाल सूरज कुंड बना हुआ है। यहां कार्तिक के महीने में पूर्णिमा को मेला लगता है। इसे राजा पूरन सिंह ने बनवाया था। वह सरई गुदौली गांव के थे और बादशाह नसीरूद्दीन हैदर के सेनापति थे।

कुछ दिन तक ये शह अवध के खजांची भी रहे और बादशाह के प्रमुख सलाहकारों में गिने जाते थे। इस चर्तुभुज पक्के तालाब के पूर्व में एक खूबसूरत सूर्य मंदिर भी है जिसके चारों कोनों पर भगवान शंकर, पार्वती, दुर्गा और हनुमान के मंदिर बने हुए हैं।

इसी तालाब के एक ओर गायों के पानी पीने के लिए गऊघाट भी बना है। सूरज कुंड की खास बात यह है कि यहां बीचों-बीच एक धर्मधुरी नाम की सरावन गड़ी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि यह 150 साल पुरानी है लेकिन इसकी लकड़ी पर कोई असर नहीं पड़ा है।

बख्शी का तालाब
बादशाह अमजद अली शाह की फौज के इंतजामकार कन्नौज के कायस्थ राजा त्रिपुर चंद्र बख्शी थे। एक बार नवाब साहब ने फौज के लिए कुछ हाथी खरीदने के लिए नेपाल जाने का कहा।

राजा बख्शी ने नेपाल यात्रा में खैराबाद की तरफ जाते हुए पहला पड़ाव इसी स्थान पर किया जहां पर आज यह तालाब है। रात में उन्हें एक सपना आया और उन्होंने वहां एक मंदिर बनवाने का निश्चय लिया। वह वापस लखनऊ आ गए और सारी बात नवाब को बता दी।

इतिहासकार डॉ. योगेश प्रवीण अपनी किताब 'लखनऊनामा' में लिखते हैं कि इसे बनाने में कई साल लग गए और यह सन् 1840 में पूरी तरह तैयार हो गया। इस तालाब में चार घाट और आठ बुर्ज बने हैं। पूर्व की ओर हवेलीनुमा पुराना घाट बना हुआ है जिसमें पानी की धारा जाने और नहाने की अच्छी व्यवस्था है।

राजा त्रिपुर ने यहां एक बाग भी बनवाया जिसे शाही बाग या भीतरी बाग भी कहते हैं। हालांकि आज यह अपने मूल स्वरूप में नहीं हैलेकिन एक दौर था जब वाजिद अली शाह की बेगमें सावन के महीने में इस तालाब के किनारे झूला झूलने और सैर-सपाटे के लिए आया करती थीं।

हुसैनाबाद का तालाब
इसे अवध के तीसरे बादशाह मुहम्मद अली शाह ने बनवाया। जिस साल बारादरी का निर्माण हुआ उसी साल इस खूबसूरत तालाब का निर्माण भी पूरा हुआ। इस खूबसूरत तालाब के किनारे दो हमामखाने भी बने हुए हैं, जिनमें उस जमाने में गर्म और ठंडे पानी आने का पूरा इंतजाम था।

इस तालाब के सोते का सम्बंध गोमती के पानी से भी है इसलिए बरसात के दिनों में तालाब के पानी स्तर बहुत बढ़ जाता है। इसकी जगह की खूबसूरती के महत्व को समझते हुए सन् 1882 में अंग्रेज शासकों ने हुसैनाबाद का मशहूर घंटाघर बनवाया था।

चांदगंज का तालाब
बादशाह नसीरुद्दीन हैदर के समय में लखनऊ में 'चांदगंज खुर्द' और 'चांदगंज कलां' नाम के दो मुहल्ले गोमती के उस पर बसे हुए थे। चांद बेगम के नाम से मशहूर इस मुहल्ले में एक ऊंचे स्तंभ पर बड़ा-सा चांदी का चांद लगा था। इसी के पास 'गंगा दरोगा' का पुराना तालाब है।

शाहे अवध के दरबार का मुलाजिम गंगा नाम का एक कहार बहुत जल्दी तरक्की करके महल का दरोगा बन गया था और उसने ही यह तालाब बनवाया। इस चौकोर तालाब में पक्की सीढ़ियों के साथ चारों कोनों पर चार बुर्ज बने हुए हैं। परम्परा के अनुसार उत्तर की ओर गऊघाट और पूर्व की ओर स्नानघाट है। गोरे यहां अक्सर पिकनिक मनाने आया करते थे।

घुड़घुड़ी का तालाब
लखनऊ से मोहान जाने वाली सड़क पर 12 किमी दूर गुरुगढ़ी का तालाब है जिसे लोग घुड़घुड़ी का तालाब कहते हैं। इसे मंडी सआदतगंज के एक हिंदू गुरुदयाल ने 19वीं सदी में बनवाया था। इसके किनारे दुर्गा मंदिर और हनुमान मंदिर है। यहां कार्तिक पूर्णिमा को मेला लगता है जिसमें अच्छी-खासी भीड़ उमड़ती है।
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